मुरादाबाद के अहले सुन्नत के मशहूर दारुल उलूम जामिया नईमिया के दारुल इफ्ता ने शौकतनगर और आलियागंज के निकट तामीर की गई यूनिवर्सिटी के लिए कब्रिस्तान की जमीन इस्तेमाल करने और ताकत के बल पर किसानों की सस्ते में जमीन खरीदने को लेकर फतवा जारी किया है। फतवे में कहा गया कि ऐसा करना हराम है। ऐसा करने वाले खुल्लम खुल्ला अल्लाह से तौबा करें और सताए हुए मुसलमानों से माफी मांगे। माफ न करने पर उनके हुकूक वापस करें।
तंजीम अवामे एहले सुन्नत के सदर मोहब्बे अली नईमी ने दारुल उलूम जामिया नईमिया के दारुल इफ्ता से फतवा मांगा था। सवाल था कि सींगनखेड़ा के मझरे आलियागंज और शौकतनगर के निकट तामीर की गई यूनिवर्सिटी के लिए कब्रें खोदकर सड़क निकाल ली गई। यूनिवर्सिटी के लिए शौकतनगर और आलियागंज के मुसलमानों की जमीन प्रशासन की ताकत के बल सस्ते में खरीदी गई। क्या शरीयत के मुताबिक ऐसा करना दुरुस्त है? जबकि ऐसा कराने वाले मुसलमान ही नहीं, बल्कि अपने आप को मुसलमानों के ठेकेदार भी समझते हैं।
फतवे का जवाब था: मुसलमानों की कर्बों का एहतराम लाजिम और जरूरी है।
उन पर चढ़ना, रोड बनाना, मकान व दुकान बनाया नाजायज व हराम है। कब्रों की तौहीन मुसलमान मुर्दों को ईजा व तकलीफ पहुंचती है। इजाए मुस्लिम हराम है। कुरान व हदीस और फिका की किताबों में इसकी वजाहत मौजूद है। जो लोग ऐसा करते हैं वह मलऊन (जिस पर अल्लाह की लानत हो) और मरदूद (अल्लाह के दरबार से दुत्कारा गया) हैं। ऐसे लोग सख्त अजाब-ए- इलाही के हकदार हैं।
यूं ही मुसलमानों की जमीन को बहुत कम दामों पर अपने ओहदे का नाजायज इस्तेमाल और प्रशासन का सहारा लेकर खरीदना उनको तकलीफ देना व दिल दुखाने का सबब है जो कि हराम है। लिहाजा जिन लोगों ने ऐसा नाजायज व हराम किया है और मुसलमानों को हुकूक को रौंद कर सताया है वह खुल्लम खुल्ला अल्लाह से तौबा करें। साथ ही सताए हुए मुसलमानों से माफी मांगे। अगर मुसलमान माफ न करें तो उनके हुकूक को वापस करें।