जिला पंचायत चुनावों में बसपा का सूपड़ा साफ हो गया है। बसपा के जोन कोआर्डिनेटर सुरेंद्र सिंह सागर, पत्नी और बेटे सहित चुनाव हार गए हैं। जिलाध्यक्ष रविंद्र सिंह रवि के भाई रतेंद्र सिंह रवि भी चुनाव हार गए हैं। प्रेमपाल सैनी की पत्नी शिवाली सैनी भी वार्ड नंबर 21 से चुनाव हार गई हैं।
सिर्फ वार्ड नंबर सात से बिलाल अली ने चुनाव जीतकर पार्टी की लाज बचाई है। जिला पंचायत चुनाव में बसपा के बदतर प्रदर्शन को लेकर पार्टी के अंदर चर्चा शुरू हो गई है। पार्टी ने कई कागजी नेताओं को किनारे लगाने का मन बना लिया है।
जिला पंचायत चुनाव की घोषणा के बाद से बसपा नेताओं की ओर से बड़े-बड़े दावे किए जाने लगे थे।
जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई तो बसपा के कई नेताओं को लगा कि उनकी लाटरी लगने वाली है। कई नेता जिला पंचायत अध्यक्ष बनने का ख्वाब देखने लगे। सपने को हकीकत में बदलने के लिए बसपा नेताओं में चुनाव लड़ने की होड़ सी मच गई।
बसपा के जोन कोआर्डिनेटर सुरेंद्र सिंह सागर खुद वार्ड 34 से चुनाव लड़े, उनकी पत्नी ऊषा सागर वार्ड 27 से और उनके बेटे अंकुर सागर वार्ड 20 से चुनाव मैदान में उतरे। तीनों ही बुरी तरह से पराजित हुए। बसपा के जिलाध्यक्ष रविंद्र रवि के भाई रतेंद्र सिंह रवि भी वार्ड 26 से चुनाव हार गए। बिलाल को छोड़कर बसपा समर्थित सभी चुनाव हार गए हैं।
2010 के जिला पंचायत के चुनावों में बसपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा था। अब्दुल सलाम निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष चुने गए थे। 2010 में बसपा ने 29 में 13 सीटों पर कब्जा किया था। 2015 में यह आंकड़ा 35 में एक रह गया है।
बसपा के चुनाव हारने का कारण पार्टी के दो बड़े नेताओं में चल रही गुटबाजी है और नोएडा अथारिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह के नजदीक माने जाने वाले नेताओं को प्राथमिकता देना बताया जा रहा है। पार्टी ने जमीन से जुड़े नेताओं को किनारे करके ऐसे लोगों को आगे बढ़ा दिया, जिनकी यादव सिंह से नजदीकी थी।