देवोत्थान एकादशी पर जिलेभर में पूजन किए गए। महिलाओं ने उपवास रखकर देवताओं का पूजन किया। कई स्थानों पर तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन भी किया गया। सूप या बर्तन को गन्ने से बजाकर भगवान विष्णु को जगाया गया। गुड़, गन्ना और सिंघाड़े से पूजन किया गया।
रविवार को जिलेभर में घर से लेकर मंदिरों तक में देवोत्थान एकादशी मनाई गई। भक्तों ने मंदिर पहुंचकर शंख, घंटे-घड़ियाल बजाकर पूजन किया। घरों में पूजन कर भगवान विष्णु को जगाकर घर में प्रवेश के लिए आह्वान किया गया। भगवान विष्णु से प्रार्थना की गई कि दरिद्रता हटाकर और सुख-समृद्धि के साथ घर में प्रवेश करें।
पंडित संतोष शर्मा ने बताया कि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु शयन के लिए जाते हैं। चार मास के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी पर जागते हैं। इसीलिए इसे देव प्रबोधन एकादशी या देवोत्थान एकादशी कहते हैं।
भगवान विष्णु के शयन के दौरान वैवाहिक और मांगलिक कार्य निषिद्ध होते हैं, जो देवोत्थान एकादशी से शुरू होते हैं। अग्रवाल धर्मशाला स्थित महालक्ष्मी मंदिर में पंडित विश्वनाथ मिश्रा ने हवन कर तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन किया। देवोत्थान एकादशी पर जिले भर में सैकड़ों वैवाहिक कार्यक्रम हुए।
शुभ लग्न के कारण अधिक शादियां ,हुईं जिससे अधिकतर बैंक्वेट हॉल भरे रहे। ज्वालानगर के रजा टेक्सटाइल कालोनी में मां खीर भवानी के दरबार में भी देवोत्थान एकादशी पर विशेष पूजन किया गया। इस दौरान पंडित मुन्ना हरि ने तुलसी पूजन किया गया।