रामपुर। सपा सरकार में तत्कालीन नगर विकास मंत्री आजम खां ने गांधी समाधि के पास तीन गेट बनवाए थे। इन गेटों का उन्होंने नामकरण भी किया था। अब इन गेटों का नाम बदलने का काम शुरू कर दिया गया है। गांधी समाधि के पास बने एक गेट बाब-ए-निजात पर मेजर अब्दुल राफे खां का नाम लिख दिया गया है। मेजर अब्दुल राफे खां रामपुर के वीर सपूत थे जो युद्ध में शहीद हो गए थे। मेजर राफे को मरणोपरांत वीर चक्र से नवाज गया था।
सपा सरकार में तत्कालीन नगर विकास मंत्री मोहम्मद आजम खां ने नवाबी दौर में बने गेटों को तुड़वा दिया था। तोपखाना गेट से लेकर नवाब गेट तक ध्वस्त करा दिए थे। इसके बाद तीन नए द्वार बनाए थे जिसमें नवाब गेट के स्थान पर बाब-ए-हयात और बाईपास पर बाब-ए-निजात गेट बनाए गए थे। नवाब गेट का नाम भी बदल दिया था। करीब 80-80 लाख रुपये की लागत से बने इन गेटों को बहुत ही खूबसूरत तरीके से बनाया गया था। इसमें बाब-ए-इल्म नाम से भी गेट बनाया गया था। बाब-ए-हयात और बाब-ए-निजात गेट पर स्टील से नाम लिखे गए थे जिसके ऊपर सोने का पानी चढ़ाया गया था ताकि इसमें जंग न लगे। लेकिन भाजपा की सरकार आने के बाद सांसद आजम खां पर शिकंजा कसा जाने लगा। अब सपा सरकार में बने गेटों के नाम भी बदले जाएंगे। ये नाम स्थानीय लोगों के नाम पर होंगे जिनका रामपुर और देश के लिए अहम योगदान रहा है। इसमें बाब-ए-निजात गेट पर मेजर अब्दुल राफे खां द्वार अंकित भी कर दिया गया है जबकि बाब-ए-हयात और बाब-ए-इल्म गेट को साहबजादा कर्नल यूनुस खां और मौलाना इम्तियाज खां अर्शी का नाम दिया जाएगा। इसके अलावा जिला प्रशासन के आदेश के बाद ज्वालानगर स्थित राम रहीम चौक को दुुरुस्त कराया जा रहा है जहां आजम खां के नाम का पत्थर लगा था। अब इस पत्थर को हटाया जा चुका है।
कौन थे साहबजादा कर्नल यूूनुस खां, अब्दुल राफे खां और मौलाना इम्तियाज खां अर्शी
रामपुर। साहबजादा युनूस खां ने 1942 में ब्रिटिश इंडियन आर्मी ज्वाइन की थी। दूसरे विश्वयुद्ध में ये रंगून यानी वर्मा में तैनात थे। उसके बाद 1945 में इटली में रहे। दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद लार्ड माउंटबेटेन से मिले। लार्ड माउंटबेटेन ने उन्हें अपना एडीसी नियुक्त कर दिया था। उनके भाई साहबजादा याकूब खां पाकिस्तान चले गए। वे पाकिस्तान आर्मी में थे। 1948 में भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध में दोनों भाई एक दूसरे के खिलाफ अपने वतन के लिए जंग लड़े। इसके बाद कर्नल यूनुस खां भारत के अंतिम गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी और देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के एडीसी भी रहे। 1962 के युद्ध में वे कश्मीर में रहे जबकि 1965 के युद्ध में बरेली में तैनात रहे। 1984 में उनकी मौत हो गई जबकि अब्दुल राफे खां ने भी देश की सेवा में अपनी जान कुर्बान कर दी। वे आठवीं गढ़वाल राइफल्स में तैनात थे। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया। मौलाना इम्तियाज खां अर्शी का भी रामपुर के गौरव से गहरा नाता रहा है। वे रजा लाइब्रेरी में तैनात थे। उन्हीं की देखरेख में रजा लाइब्रेरी का किताबी खजाना हिफाजत से रहा और आज रजा लाइब्रेरी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है।