आजम खां के खेमे की बेचैनी बेसबब नहीं है। बेशक कलक्टर - कप्तान को टारगेट करके ही सही लेकिन उनके सिपहसलारों के मुंह से हार की आशंका जैसे शब्द यूं ही नहीं निकले। दरअसल इस बेचैनी की वजह रामपुर में 15 फरवरी को हुई वोटिंग के आंकड़ों में छुपी है।
रामपुर की सदर सीट पर पहली बार बदले वोटिंग ट्रेंड ने इस कद्दावर सपा नेता के खेमे को भी उलझन में डाल दिया है। वोटिंग के आंकड़ों पर गौर करें तो रामपुर में हिंदू बहुल इलाकों में 96 फीसदी तक मतदान हुआ है जबकि आजम के गढ़ कहे जाने वाले मुस्लिम इलाके 49 फीसदी से लेकर महज 65 प्रतिशत के बीच ही ढेर हो गए। सियासत के धुरंधर आजम खां खुद भी इन आंकड़ों के मायने अच्छी तरह समझते होंगे।
हालांकि इस बार वोटिंग में रामपुर ने पिछले दो चुनावों का रिकार्ड तोड़ दिया है। लेकिन बदले मतदान प्रतिशत के साथ ही रामपुर की सदर सीट पर वोटरों का मिजाज भी बदला नजर आया है। आजम की इस सीट पर इस बार उन्हीं के गढ़ों में वोटर बूथ से दूर रहे। आजम के जबरदस्त प्रभाव वाले शहर के मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटिंग प्रतिशत पिछले सालों की तुलना में कम रहा है। जबकि इसके ठीक विपरीत हिंदू इलाकों में वोटिंग 96 प्रतिशत तक हुई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो रामपुर की सदर सीट पर ऐसा पहली बार हुआ है जब हिंदू वोटरों ने रिकार्ड वोटिंग की है। वजह और नतीजे चाहे जो भी हाें लेकिन फिलहाल ये बूथवार आंकड़े आजम के खेमे में खलबली के लिए काफी हैं। यही वजह है कि आजम के सिपहसलारों ने कलक्टर - कप्तान पर खुलकर आरोप लगाया है कि उन्हाेंने वोटिंग वाले दिन दहशत फैलाकर सपा के वोटरों को घर से नहीं निकलने दिया।
दरअसल पिछले चुनावों में आजम के गढ़ कहे जाने वाले जिन बूथों पर 80-85 फीसदी पोलिंग हुआ करता था, वहां इस बार महज 60-65 फीसदी मतदान हुआ है। कुछ बूथों पर तो ये आंकड़ा महज 49 फीसदी तक सिमट गया है।