काश! विरोध न होता तो मुरादाबाद में होती मुस्लिम यूनिवर्सिटी
रामपुर। यह बात शायद बहुत कम लोगों को पता है कि अलीगढ़ में मुस्लिम यूनिवर्सिटी की आधारशिला रखने वाले सर सैयद अहमद खां का मुरादाबाद से गहरा ताल्लुक रहा है। वह मुरादाबाद में मुंसिफ मजिस्ट्रेट रहे थे। उन्होंने मुरादाबाद में डेढ़ सौ साल पहले आधुनिक मदरसा खोला था, उनकी मंशा मुरादाबाद में ही मुस्लिम यूनिवर्सिटी स्थापित करने की थी, लेकिन तब अंग्रेजी तालीम का विरोध होने के कारण यह संभव नहीं हो सका। रामपुर स्थित रजा लाइब्रेरी में सर सैयद अहमद खां के जन्मदिन 17 अक्तूबर के दिन एक ऐसी प्रदर्शनी लगाई जा रही है, जिसमें 30 अक्तूबर तक सर सैयद अहमद खां से जुड़ा इतिहास और उनकी लिखी और उन पर लिखी किताबों को प्रदर्शित किया जाएगा।
मुरादाबाद के उर्दू लेखक मिर्जा मुर्तजा इकबाल कहते हैं कि 22 वर्ष की उम्र में पिता की मृत्यु के बाद सर सैयद ने 1830 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी में बाबू के रूप में काम शुरू किया। लेकिन, वह हाथ-पर-हाथ धर कर बैठने वालों में से नहीं थे। उन्होंने मेहनत की और तीन वर्ष बाद 1841 ई. में मैनपुरी में उप-न्यायाधीश की योग्यता हासिल की। विभिन्न स्थानों पर न्यायिक विभाग में काम किया। वह 1857 में गदर के दौरान मुरादाबाद में मुंसिफ थे। इस दौरान उन्होंने 1858 में मुरादाबाद के शौकत बाग में आधुनिक मदरसा की स्थापना की। उनका मकसद मुरादाबाद में ही मुस्लिम यूनिवर्सिटी कायम करना था। लेकिन, तब अंग्रेजी के विरोध के कारण वह यहां ऐसा नहीं कर सके। बुजुर्ग उर्दू लेखक मास्टर अतीक कहते हैं कि उनकी शादी बीवी पारसा बेगम से 1861 में हुई। जोकि, उनकी खाला फखरुल निशां की बेटी थी। फखरुल निशा और पारसा बेगम की कच्ची कब्रें आज भी मुरादाबाद में मौजूद हैं। अतीक साहब कब्रों की देखरेख करते हैं। आधुनिक मदरसा बंद हो गया, अब वहां लड़कियों का सरकारी स्कूल चल रहा है। अलगीढ़ में मुंशिक रहते हुए ‘वैज्ञानिक समाज’ की स्थापना 1864 ई. में सर सैयद अहमद ख़ां ने की। 1875 ई. में ‘अलीगढ़ मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कालेज’ की स्थापना की। बाद में इसे ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाया।
विरोध के बाद भी आधुनिक शिक्षा के युग पुरुष
मिर्जा मुर्तजा इकाबाल कहते हैं कि सर सैयद अहमद खां का जन्म 17 अक्तूबर 1817 को दिल्ली के सादात (सैयद) ख़ानदान में हुआ था। वह एक ऐसे महान मुस्लिम समाज सुधारक और भविष्य दृष्टा थे, जिन्होंने शिक्षा के लिए जीवनभर प्रयास किया। उन्होंने लोगों को पारंपरिक शिक्षा के स्थान पर आधुनिक ज्ञान हासिल करने के लिए प्रेरित किया। वह जानते थे कि आधुनिक शिक्षा के बिना तरक्की संभव नहीं है। अंग्रेजी शिक्षा पर जोर देने के कारण उस दौर में मुसलमान और हिंदुओं ने विरोध भी किया, लेकिन वे विरोध के स्वर चुपचाप सहन करते रहे। उनकी सहनशीलता का परिणाम है कि आज सर सैयद को युग पुरुष के रूप में याद किया जा रहा है।
रजा लाइब्रेरी में 30 तक चलेगी प्रदर्शनी
रामपुर रजा लाइब्रेरी के निदेशक प्रोफेसर सैयद हसन अब्बास कहते हैं कि सर सैयद के इतिहास से जुड़ी और उनकी लिखी किताबें लाइब्रेरी में प्रदर्शित की जाएंगी। प्रदर्शनी में सर सैयद पर भी जितनी किताबें लिखी गई हैं, वह हमारे पास हैं उन्हें भी लोगों की जानकारी के लिए प्रदर्शित किया जाएगा। 17 अक्तूबर को सर सैयद के जन्मदिन से लेकर 30 अक्तूबर तक लगातार चलेगी।
हिंदू-मुसलमान भारत की दो आंखें
रामपुर। उर्दू लेखक मास्टर अतीक अहमद कहते हैं कि सर सैयद अहमद ख़ां ने सदा ही यह बात अपने भाषणों में कही थी कि, ‘हिंदू और मुसलमान भारत की दो आँखें हैं’। उन्हें पिता की तुलना में मां का अधिक प्यार मिला। 1857 में गदर के दौरान वह मुरादाबाद में ही तैनात थे। उनके द्वारा लिखी किताब भारतीय विद्रोह के कारण में उन्होंने कुशलता व निर्भीकता से ब्रिटिश प्रशासन की उन कमजोरियों और गलतियों को उजागर किया। जिनके कारण असंतोष और देशव्यापी विरोध पनपा था। इस पुस्तिका को अंग्रेज अधिकारियों ने बारीकी से पढ़ा और ब्रिटिश नीति पर इसका उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा। सर सैयद ने ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना, जनक्रांति के कारणों पर 1859 ई. में ‘असबाबे-बगावते-हिंद’ शीर्षक एक महत्वपूर्ण पुस्तिका लिखी और उसका अंग्रेजी अनुवाद ब्रिटिश संसद को भेज दिया। सर सैयद के मित्र राय शंकर दास ने जो उन दिनों मुरादाबाद में मुंसिफ थे सर सैयद को समझाया भी कि वे पुस्तकों को जला दें और अपनी जान खतरे में न डालें। किंतु सर सैयद ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उनका यह कार्य देशवासियों और सरकार की भी भलाई के लिए आवश्यक है। क्रांति के जोखिम भरे विषय पर कुछ लिखने वाले सर सैयद प्रथम भारतीय हैं।
सर सैयद अहमद खां ने उस दौर में आधुनिक शिक्षा का अलख जगाया था, तब उन्हें इसका विरोध भी झेलना पड़ा। आज उनकी दी हुई शिक्षा संस्था के छात्र दुनिया के 92 देशों में फैले हुए हैं। रजा लाइब्रेरी उनसे जुड़ी शिक्षण सामग्री और किताबों की बेहद कद्रदान है।
प्रो. सैयद हसन अब्बास, निदेश रजा लाइब्रेरी रामपुर