रामपुर। रजा लाइब्रेरी और कौमी काउंसिल फरोग उर्दू जुबान की ओर से रजा लाइब्रेरी सभागार में उर्दू, अरबी-फारसी साहित्य में मौलाना अरशी के योगदान विषय पर सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें वक्ताओं ने मौलाना अरशी के जीवन पर रोशनी डाली।
सेमिनार का उद्घाटन दिल्ली विवि के फारसी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. शरीफ हुसैन क़ासमी, अलीगढ़ मुस्लिम विवि कला संकाय के डीन प्रो. मसूद अनवर अल्वी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विवि के कला संकाय के डीन प्रो. वहाजुद्दीन अल्वी ने किया। कार्यक्रम में डॉ. मुमताज अरशी और डॉ. नजफ़ अरशी विशिष्ठ अतिथि रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. ख़ान मोहम्मद आतिफ ने की। इस अवसर पर प्रो. शरीफ हुसैन क़ासमी ने कहा कि मुझे खुशी हुई कि मौलाना अरशी साहब के छोटे साहिबजादे ने उनकी सेवाओं का वर्णन विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने अरशी साहब के हवाले से तारीखे मोहम्मदी के तीन नुस्खों को भी अपने शोध के माध्यम से प्रस्तुत किया। प्रो0 मसूद अनवर अल्वी ने कहा कि मौलाना अरशी साहब 1962 में मेरे घर तशरीफ लाए और उनसे मुलाकात का मौका मिला था। रजा लाइब्रेरी में अरशी साहब बहुत बड़ा योगदान रहा है और मौलाना साहब की खिदमातों को कभी नहीं भुलाया जा सकता। प्रोफेसर खान मोहम्मद आतिफ ने उनकी शख्सियत और व्यक्तित्व पर रोशनी डालते हुए कहा कि झूठ और बुराई उनके मसलन में हराम थी। वो अहले इल्म के कद्रदान थे और अपने अधीनस्थों/सहयोगियों के साथ मेहरबान थे। रजा लाइब्रेरी के निदेशक प्रो. सैयद हसन अब्बास ने कहा कि मौलाना अरशी मशरिकी उलूम ओ फनूून के उर्दू अदब और फारसी कैटलागिंग में अपनी खिदमात पेश कीं। उन्होंने अपनी उम्र का ज्यादातर हिस्सा लाइब्रेरी में अंजाम दिया। उन्होंने अरबी पाण्डुलिपियों की छह भाग प्रकाशित किए। डॉ. नजफ़ अरशी ने अपने शोध पत्र हसात और अरबी अदब की खिदमात के अंश प्रस्तुत किए। डॉ. मुमताज अरशी ने कहा कि मेरी नजर में ऐसा कोई भी शोधार्थी या लाइब्रेरियन नहीं है जिसने आज तक रजा लाइब्रेरी में मौजूद उर्दू, अरबी, फारसी मखतूतात का अध्ययन नहीं किया होगा। प्रो. वजीर हसन ने कहा कि मौलाना अरशी ने विभिन्न लाइब्रेरी में उपलब्ध पांडुलिपियों के शोधकार्य, संपादन, संकलन और प्रकाशन के कार्य को अत्यधिक प्रोत्साहन दिया। इस अवसर पर प्रो. अलीम अशरफ ख़ां, डॉ. किश्वर सुल्ताना, प्रो. वहाजुद्दीन अलवी, डॉ. शायारुल्लाह खां, डॉ. सैयद अरशद रिजवी ने भी अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए और विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन शबाना ने किया। कार्यक्रम में डॉ. अबुसाद इस्लाही, नासिरउद्दीन एडवोकेट, सरदार जावेद ख़ां, शौकत अली ख़ां, डॉ. मेहंदी हसन, डॉ. जहीर अली सिद्दीक़ी आदि मौजूद रहे।