जगतपुर (रायबरेली)। ...हर तरफ मलबे का ढेर है। बमबारी और गोलीबारी के शोर से लोग डरे हुए हैं। रूस के लड़ाकू विभान फर्राटा भर रहे हैं। जिधर देखो, उधर खौफनाक मंजर नजर आता है।
हमले में तबाह हुईं कारें जल रहीं हैं। लोग दाने-दाने के मोहताज हो गए हैं। तीन दिनों तक हम भी भूखे-प्यासे रहे। जीने की उम्मीद छोड़ चुके थे। कोई किसी की मदद के लिए तैयार नहीं था।
यदि मुसीबतों से निकलना है तो खुद ही प्रयास करो। अजनबी शहर से बचकर निकल आना किसी चमत्कार से कम नहीं है। यूक्रेन के हालात बयां करते हुए मेडिकल छात्र अर्सलान अहमद अपने आंसू नहीं रोक पाएं। अर्सलान ने बताया कि युद्ध के दौरान विदेश में भारतीय होने का मतलब पता चला। अब खुद पर गर्व हो रहा है।
जगतपुर के मतीनगंज गांव निवासी अर्सलान अहमद यूक्रेन सुमी शहर स्थित डेनप्रो यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं।
अर्सलान कहते हैं कि दो देशों के बीच चल रहे तनाव को लेकर वहां पर स्थिति भयावह हो गई है, जिसके बाद कुछ दिनों के लिए सारी फ्लाइट रद्द कर दी गईं हैं।
...कर्फ्यू सा माहौल है। दुकानें सभी बंद हैं। हर समय बमबारी हो रही है। तीन दिन तक यूनिवर्सिटी के कमरे में थे। खाना-पानी तक नहीं मिला। भूखे रहना पड़ा।
इसके बाद उन्होंने भारतीय दूतावास से संपर्क किया। इस पर भारतीय दूतावास ने हंगरी पहुंचने की सलाह दी। गोलीबारी के बीच 700 किमी. की दूरी तय कर हंगरी पहुंचना कोई आसान काम नहीं था। पर हिम्मत नहीं हारी।
करीब 18 घंटे का सफर तय कर हंगरी पहुंचना था। 27 फरवरी को डेन प्रो यूनिवर्सिटी से हंगरी के लिए निकल पड़े। 200 किमी. का सफर ट्रेन से तथा 500 किमी. का सफर बस से तय किया था।
हंगरी पहुंचने पर फ्लाइट के माध्यम से दिल्ली लाया गया। अर्सलान ने बताया कि युद्ध जैसे कठिन हालात में पता चला कि भारतीय होने का मतलब क्या है।
बताया कि सरकार के बेहतर प्रबंधन की बदौलत दिक्कत नहीं हुई। दिल्ली से घर पहुंचाया गया। यहां घर पहुंचने ऊंचाहार तहसीलदार अजय गुप्ता मौके पर पहुंचे और छात्र का स्वागत किया।
घर पहुंचने पर अर्सलान के पिता आले हसन, माता नूरबानो तथा अन्य परिवारीजनों ने खुशी जताई। बेटे के घर पहुंचने पर मोदी सरकार की सराहना की और कहा कि पीएम मोदी की बदौलत मेरा बेटा सही सलामत घर पहुंच गया है।
आठ दिनों तक भूखा रहा, रोमानिया बार्डर पहुंचने पर मिला खाना
अमावां। अमावां बाजार निवासी मेडिकल छात्र अभिषेक सिंह चौहान रविवार को घर पहुंचे तो अपने लाल को सामने देख परिवारीजनों के खुशी के आंसू छलक पड़े।
छात्र ने बताया कि जिस दिन से युद्ध छिड़ा, हम लोग किसी तरह अपने आप को सुरक्षित करते हुए भूखे प्यासे और पैदल चलकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचते थे। लगभग सात दिनों तक बंकर में छिपकर अपनी जान बचाई। आठ दिन तक भोजन नहीं किया। बिस्कुुट खाकर किसी तरह पेट भरना पड़ता था।
किसी तरह हम लोगों को बस से रोमानिया बार्डर पहुंचाया गया, जहां से भारत की सरकार की मदद से हम घर पहुंचे। ऊपर वाले का शुक्र है कि हम अपने देश लौट आए। वहां पर जिस तरह के हालात हैं, उससे उम्मीद ही छोड़ चुके थे कि अब कभी अपनों से मुलाकात भी हो पाएगी।
बेटे के घर पहुंचने पर पिता दिलीप सिंह चौहान और मां किरन सिंह समेत अन्य परिवारीजनों ने खुशी जताई। पिता ने बताया कि परिवार के सभी सदस्य जिस दिन से युद्ध छिड़ा था, उस दिन से बेटे को लेकर परेशान थे। मां का कहना है कि जिस दिन यूक्रेन में एक भारतीय बच्चे की मौत हो गई थी, उस दिन तो आंसू बंद नहीं हो रहे थे। बस बेटे को याद करती थी। हां इतना भरोसा था कि पीएम मोदी जरूर हमारे बच्चों को सकुशल बचा लाएंगे।