जश्न-ए-अदब की ओर से राष्ट्रीय एकता पर आधारित पांचवां अंतर्राष्ट्रीय काव्योत्सव आईटीआई ऑफीसर्स क्लब परिसर में हुआ। देर रात तक चले कार्यक्रम में शायर और कवियों ने अपनी-अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।
मुख्य अतिथि पुलिस महानिदेशक उत्तर प्रदेश जावीद अहमद ने प्रयास की सराहना की। मुंबई के पुलिस कमिश्नर शायर कैसर खालिद ने सुनाया ‘सूरज यकीन लेके निकल आया आज, फिर मायूसियों से शब भर हुआ सामना तो क्या...,’।
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निदेशक शायर मनीष शुक्ल ने पढ़ा ‘किसी के इश्क में बर्बाद होना हमें आया नहीं...’ की सभी ने प्रशंसा की। पद्मश्री अशोक चक्रधर ने सुनाया ‘तुम भी जल थे, हम भी जल थे, इतने घुले-मिले थे कि एक-दूसरे से जलते न थे...’।
पद्मभूषण गोपालदास नीरज ने सुनाया ‘सिर्फ बिछड़ने के लिए है ये मेल मिलाप, एक मुसाफिर हम यहां, एक मुसाफिर आप...’। पद्मश्री बेकल उत्साही ने पढ़ा,‘ कोई मन के भीतर बैठ गया, कतरे में समंदर बैठ गया...’।
शायरा किश्वर नाहिद ने सुनाया ‘हमारी प्यास रुखसत चाहती है, प्याला हाथ से अब छूटता है...’। शायर फरहत अहसास ने पढ़ा ‘जिंदगी का हर एक लम्हा दे के जाता है इक काम, जो अभी नहीं करते वो कभी नहीं करते...’।
पाकिस्तान से आए युवा शायर शकील जाज़िब ने कहा ‘फिर तुझे और मुझे और कहीं जाना है हम सफर, साथ तो चल जितनी सड़क बाकी है...’। शायर अदनान बेग ने सुनाया ‘फिर जुदाई की शाम आ पहुंची, उसकी पलकों ने सिर्फ इतना कहा अपना ख्याल रखिएगा...’।
सोनरूपा विशाल ने सुनाया ‘मेरे जज़्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है, मुझे रहना अगर जिंदा तो फिर लिखना जरूरी है...’ पर खूब तालियां बजी। शायरा सिया सचदेव ने सुनाया ‘जिसमें शामिल ज़मी की धूल नहीं, वो बुलंदी मुझे कुबूल नहीं...’।
शायर विशाल बाघ ने सुनाया ‘हम निकल आये जिस्म से बाहर, उसने कुछ इस तरह पुकारा था...’। जय चक्रवर्ती ने सुनाया ‘पढ़े बिन प्रेम के आखर न ज्ञानी बन सका कोई, ज़रा सी बात थी लेकिन न तुम समझे न हम समझे....।
संचालन करते हुए रंजीत सिंह चौहान ने पढ़ा ‘न आरज़ू, न जुस्तजू तो गुफ्तगू कहां, जो मैं ही मैं नहीं रहा तो तू भी तू कहां...’। इस मौके पर आईटीआई के उप महाप्रबंधक आलोक सक्सेना, वीबी सिंह, रजनी एक्का, कौशल कुमार मौजूद रहे।