आबादी में बढ़ती मोबाइल टॉवरों की संख्या मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रही है। मीठे जहर का काम कर रहा रेडिएशन लोगों को हृदय व अन्य अंगों से संबंधित बीमारियों में जद में ला रहा है।
यही नहीं खास बात तो यह है कि देश की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी बीएसएनएल के अफसरों को ही टॉवरों की स्थापना के मानकों की जानकारी नहीं है। ऐसे में जनजीवन को प्रभावित होने से कैसे बचाया जाएगा, यह एक सवाल बना हुआ है।
जिले में बीएसएनएल और विभिन्न निजी कंपनियों के करीब 500 मोबाइल टॉवर लगे हुए हैं। सुविधाओं की बेहतरी के लिए सिर्फ बीएसएनएल ने अपने 175 टॉवरों की स्थापना की है।
मोबाइल कंपनियां नेटवर्क बेहतर करके ग्राहकों को रिझाने के लिए टॉवरों की संख्या तो बढ़ाती जा रही हैं, लेकिन मानकों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।
चिकित्सकों की माने तो रेडिशन मानव स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक है। इससे लोग तमाम तरह की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं, बावजूद इसके टॉवरों की धड़ल्ले से आबादी में स्थापना हो रही है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ वाह्यरोग विशेषज्ञ डॉ. बीरबल का कहना है कि रेडिएशन मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। रेडिएशन का सबसे ज्यादा असर ब्रेन, फेफड़े, गुर्दे और लीवर पर पड़ता है।
लगातार रेडिएशन के संपर्क में रहने से कोशिकाएं अनियमित व्यवहार करने लगती है। इससे कैंसर जैसी बीमारी भी हो सकती है।
शहर से लेकर गांव तक आबादी में हो रही मोबाइल टॉवरों की स्थापना से लोगों में रोष है। सिंह विहार कॉलोनी, इंदिरा नगर के अमित कुमार, डायट प्राचार्य डॉ. आरएन सिंह, मुंशीगंज के दिलीप अग्रहरि का कहना है कि टॉवरों का आबादी में लगना हर तरह से नुकसान देह है।
स्वास्थ्य पर तो इसका असर पड़ता ही है, आबादी में टॉवरों के गिरने की दुर्घटना में तमाम जानें जोखिम में पड़ सकती है। टॉवरों की स्थापना पर अंकुश लगना चाहिए।
टीडीएम बीएसएनएल राजेंद्र जैसवारा का कहना है कि मोबाइल टॉवरों की निगरानी के लिए दिल्ली की एजेंसी टीआरएआई को जिम्मेदारी मिली है। यही एजेंसी टॉवरों की स्थापना के लिए एनओसी देती है।
साथ ही रेडिएशन की निगरानी भी करती है। टॉवरों की स्थापना के क्या मानक हैं, इसकी जानकारी नहीं है। एजेंसी से एनओसी मिलने के बाद टॉवर लगा दिए जाते हैं।