रायबरेली। जिले में संचालित 11 सहायता प्राप्त संस्कृत विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। नियमानुसार विद्यालयों में प्रधानाचार्य समेत पांच शिक्षक होने चाहिए। यहां कई स्कूल एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। काफी पुराने इन स्कूलों में संसाधनों की भी कमी है।
वर्तमान में जिले में 13 संस्कृत विद्यालय संचालित हैं। जिनमें दो विद्यालय वित्तविहीन और 11 विद्यालय सहायता प्राप्त हैं। सहायता प्राप्त विद्यालयों में महज 16 शिक्षक हैं, जबकि विद्यार्थियों की संख्या 601 है। परैया नमकसार और पाराकला के संस्कृत विद्यालयों में कोई शिक्षक नहीं है।
हालांकि इसी सत्र में पाराकला में मानदेय पर शिक्षक की व्यवस्था की गई। करहिया बाजार के विद्यालय में पांच शिक्षक तो पूरे चौहान रेवली, झकरासी नायन और बड़ागांव के विद्यालयों में दो-दो शिक्षक हैं। बाकी पांच विद्यालयों में महज एक-एक शिक्षक ही तैनात हैं।
झकरासी नायन में सबसे ज्यादा 105 बच्चे पढ़ते हैं तो परैया नमकसार में महज पांच बच्चे हैं। पुराने भवनों में चल रहे इन संस्कृत विद्यालयों में संसाधनों का भी अभाव है। अभी हाल ही में इन विद्यालयों में फर्नीचर का ब्योरा मांगा गया है।
आखिर कब होगा विद्यालयों का सुधार
जिले में संचालित संस्कृत विद्यालय काफी पुराने हैं, जिनमें सुधार की उम्मीद बरसों से की जा रही है। मानव जीवन सुधार ब्रह्मचर्य महाविद्यालय डलमऊ 1952, विश्वनाथ सिंह संस्कृत महाविद्यालय अरखा 1973, हनुमत संस्कृत विद्यालय पाराकला 1980, शिवदयाल शुक्ल महाविद्यालय नमकसार परैया 1976, राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय डलमऊ 1957, राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय राजामऊ 1969, रामपाल स्मारक यदुनाथ विद्यालय करहिया बाजार 1931, रामेश्वर झारखंड संस्कृत विद्यालय पूरे चौहान रेवली 1974, नारायण संस्कृत विद्यालय झकरासी नायन 1962, अंबिका संस्कृत विद्या मंदिर मुरारमऊ 1968 व गौरीशंकर संस्कृत विद्यालय बड़ागांव 1946 से संचालित है।
संस्कृत विद्यालयों में शिक्षकों की कमी देखते हुए मानदेय पर शिक्षकों के चयन की व्यवस्था है। वहीं संस्कृत विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों के बारे में मांगी गईं सूचनाएं उच्चाधिकारियों को भेजी जा चुकी हैं। जो निर्देश मिलेगा उसका अनुपालन होगा।
-ओमकार राणा, डीआईओएस