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ढाई दशक में सिर्फ एक बार बिछी प्रधानी चुनाव की बिसात

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रायबरेली। प्रधानी का चुनाव लड़ने के लिए वैसे तो हर गांव में मारामारी दिखती है, लेकिन जिले में एक ऐसा गांव है, जो राजनीति की सुर्खियों में ही नहीं, बल्कि पंचायत चुनाव को लेकर भी अक्सर चर्चा में रहता है।
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इस गांव की खासियत है कि ढाई दशक में एक ही बार यहां पर प्रधानी चुनाव की बिसात बिछी। यानि एक ही बार चुनावी मैदान में उम्मीदवारों ने दो-दो हाथ किए। बाकी चुनाव में ही यहां निर्विरोध प्रधान चुना गया। पहले पूर्व विधायक स्व. अखिलेश सिंह और अब उनकी बेटी मौजूदा सदर विधायक अदिति सिंह राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय होकर राजनीति सुर्खियां बटोर रही हैं।
अमावां ब्लॉक क्षेत्र का लालूपुर चौहान सदर विधायक का गांव है। वैसे तो प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था काफी पहले लागू हो गई थी, लेकिन वर्ष 1995 में ही प्रधानी चुनाव शुरू हुआ था। इस गांव में वर्ष 2015 में अखिलेश की पत्नी ने चुनाव जीता था।
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महिला पूर्व प्रधान के पति अखिलेश सिंह कहते हैं कि उनके गांव में सिर्फ एक ही बार प्रधानी का चुनाव हुआ है। चुनाव के समय में हम सब बैठ करके आपस में ही तय कर लेते हैं कि किसे गांव का प्रधान चुना जाए। उनके गांव की यह खासियत अन्य गांव के लिए मिसाल भी है। इस बार भी उनके गांव में निर्विरोध चुनाव की उम्मीद दिख रही है। इस बार गांव में एससी सीट है।
मंचितपुर में एक ही बार हुआ चुनाव
अमावां ब्लॉक क्षेत्र की मंचितपुर ग्रामसभा भी ढाई दशक में एक ही बार चुनावी शंखनाद हुआ है। 68 वर्षीय पूर्व प्रधान रामखेलावन कहते हैं कि वर्ष 1995 में पंचायत चुनाव शुरू हुए थे। उस समय हमने चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी। तब से लेकर अब तक उनके गांव में चुनाव नहीं हुए। उनका मानना है कि आज के समय में प्रधानी चुनाव को लेकर पहले की अपेक्षा अधिक मारामारी हो गई है। चुनाव जीतने के लिए जोर आजमाइश की जा रही है, लेकिन उनका गांव इन सबसे आज भी दूर है। हम सब आपस में ही बैठ करके तय कर लेते हैं कि असल में गांव का प्रधान बनने के लिए कौन हकदार है। कौन सही मायने में गांव का विकास करा सकता है। इस बार भी उनके गांव में निर्विरोध चुनाव होने की उम्मीद है।
आरक्षण ने बिगाड़ा खेल तो खोज रहे प्रत्याशी
पंचायत चुनाव जीतने का सपना संजोए कुछ लोगों के सपने को आरक्षण ने तार-तार कर दिया है। उनका इस कदर खेल बिगड़ा कि उनका पैसा भी चला गया और वह चुनावी मैदान में भी कूद नहीं पाएंगेे। कुछ ऐसे लोग रहे, जिन्होंने पांच-छह महीने से पहले से ही चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। इसके लिए पैसा भी खर्च कर रहे थे। गांव के लोगों का इलाज कराने के साथ ही उनकी हर मदद के लिए आगे आ रहे थे। आरक्षण ने खेल बिगाड़ा तो अब यह लोग ऐसे जिताऊ प्रत्याशी की खोज कर रहे हैं, जो जिताऊ हो। इन सभी का मानना है कि वह चुनाव तो नहीं लड़ पाएंगे, लेकिन दूसरे को चुनाव जिताकर जरूर वह अपना हित साध सकेंगे।
आरक्षण को लेकर लगा आपत्तियों का अंबार
पंचायत चुनाव का आरक्षण जारी होने के बाद डीपीआरओ कार्यालय में आपत्तियां का अंबार लग गया है। अब तक 250 लोगों ने आपत्तियां डाली हैं। अधिकतर लोगों की तरफ से दावा किया जा रहा है कि उनके गांव का आरक्षण कर दिया गया है, जो नियम विरुद्व है। उनके गांव की सीट अनारक्षित होनी चाहिए। जिन गांवों की सीट अनारक्षित कर दी गई हैं, वहां के लोगों का कहना है कि उनके गांव की सीट एससी होनी चाहिए। गलत तरीके से आरक्षण किया गया है। डीपीआरओ राजेंद्र प्रसाद का कहना है कि जो भी आपत्तियां आ रही हैं, उनका निस्तारण किया जाएगा।
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