रायबरेली। सांसद सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र के रायबरेली शहरवासियों को सीवर की समस्या से राहत दिलाने के लिए शुरू की गई अमृत योजना लापरवाही और कमीशनबाजी की भेंट चढ़ गई। सीवर से राहत पाने का जो उनका सपना था, वह आज तक हकीकत में नहीं बदल पाया। लापरवाही का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि योजना का न तो समय से काम पूरा हो पाया है और न ही नागरिकों को सीवर से किसी प्रकार की कोई राहत मिल पाई। यह हाल तब है, जब पहले चरण के सीवर लाइन बिछाने में ही 80 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए।
वर्ष 2018 में अमृत योजना को हरी झंडी दी गई थी। योजना के तहत शहर क्षेत्र के 34 मोहल्लों में रहने वाली ढाई लाख आबादी को सीवर की समस्या से राहत दिलाने के लिए सीवर लाइन बिछाने के लिए काम शुरू कराया गया था। यह काम जलनिगम को मिला, लेकिन उसने यह काम घारपूरे कंपनी को दे दिया था। घारपूरे कंपनी यह कार्य तोमर कंस्ट्रक्शन कंपनी से करा रही थी। पहले चरण में सीवर लाइन बिछाने के लिए 90 करोड़ रुपये खर्च किया जाना था।
मौजूदा समय में 80 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। सीवर लाइन बिछाने के लिए शहर की सड़कों की खुदाई कर दी गई, लेकिन सड़कों की मरम्मत का कार्य आज तक पूरा नहीं हो पाया है। घटिया किस्म की पाइपें डाली गई। यही वजह है कि टेस्टिंग के दौरान ही गोरा बाजार, सम्राट नगर, मनिका रोड समेत अन्य स्थानों पर पानी भरा रहता है। इतनी भारी भरकम योजना में लापरवाही और कमीशनबाजी हावी रही। मनमाने ढंग से कार्य होता रहा, लेकिन यह न तो जलनिगम और न ही जिला प्रशासन के अधिकारियों को दिखा।
यह काम पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। पहले चरण का काम तो पूरा नहीं हुआ, लेकिन दूसरे चरण का कार्य 142 करोड़ की लागत से शुरू करा दिया गया है। बताते हैं कि कुछ माह पहले बजट को लेकर नगर पालिका और जलनिगम के अधिकारियों के बीच ठन गई थी। बताते हैं कि कुछ बकाया पैसा नगर पालिका को जलनिगम के खाते में भेेजना था। नगर पालिका की ओर से पैसा नहीं दिया जा रहा था। इस पर यह मामला उच्चाधिकारियों तक पहुंच गया था। एक अधिकारी के निर्देश पर नगर पालिका की ओर से करीब साढ़े चार करोड़ रुपया जलनिगम को दिया गया था।