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विज्ञान, गणित और अंग्रेजी पर जोर, हिंदी पर नहीं देते ध्यान

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रायबरेली। माध्यमिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश की हाईस्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षा में ज्यादातर परीक्षार्थी हिंदी जैसे विषय में फेल हुए हैं। यह बहुत ही चिंता का विषय है। इसके पीछे कहीं न कहीं हिंदी के प्रति घटता रुझान और बढ़ता कंप्टीशन है। राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है। हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक तक नहीं है। शिक्षकों और पढ़ाई को लेकर सहायता प्राप्त विद्यालयों की हालत भी अच्छी नहीं है। प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जाता है, गणित और विज्ञान जैसे विषयों पर ज्यादा जोर रहता है।
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अभिभावकों का नजरिया भी कुछ ऐसा ही रहता है कि बच्चे अंग्रेजी में बोलें, गणित-विज्ञान जैसे विषयों में माहिर हों, ताकि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो सकें। बोर्ड परीक्षा के नतीजों को देखकर हिंदी के विद्वान जहां चिंता जताते हैं, वहीं गुरुजन भी नतीजों को शर्मसार करने वाला बताते हैं। छात्र-छात्राओं का कहना है कि हिंदी को छोड़कर बाकी विषयों के लिए ज्यादा दबाव बनाया जाता है, जिससे हिंदी पीछे छूट जाती है।
हिंदी की विद्वान डॉ. भुवनेश्वरी तिवारी कहती हैं कि यूपी बोर्ड परीक्षा में काफी संख्या में परीक्षार्थियों का हिंदी में फेल होना चिंता की बात है। सामाजिक परिवेश में हिंदी की उपेक्षा सहज लगाव का अभाव और अंग्रेजी के प्रति बढ़ता मोह ही मुख्य कारण है। डॉ. संतलाल का कहना है कि हाईस्कूल में आठ लाख छात्रों का हिंदी में अनुत्तीर्ण होना दुर्भाग्यपूर्ण है। इसका मतलब है कि बुनियादी स्तर पर ही हिंदी उपेक्षित हो जाती है। असिस्टेंट प्रोफेसर अशोक कुमार ने कहा कि अब तो आम बोलचाल में हिंगलिश का चलन बढ़ गया है। विद्यार्थियों की मानसिकता हिंदी के प्रति बदली है। समीक्षक डॉ. वैशाली चंद्रा कहती हैं कि हिंदी के प्रति संपूर्ण समाज का उपेक्षापूर्ण रवैया ही हिंदी की दुर्दशा के लिए उत्तरदायी है।
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राजकीय हाईस्कूल के प्रधानाचार्य विनोद त्रिपाठी कहते हैं कि प्राथमिक स्तर पर सुधार की जरूरत है। राजा चंद्रचूड़ सिंह विद्यापीठ इंटर कॉलेज महराजगंज के हिंदी प्रवक्ता मधुरेश सिंह कहते हैं कि मातृभाषा हिंदी को हम सब वैसा प्यार नहीं करते, जैसा कि उसे दरकार है। यूपी बोर्ड में इतनी बड़ी संख्या में परीक्षार्थियों का हिंदी में फेल होना शर्मसार करता है। इसके लिए शिक्षक, शिक्षार्थी औजर अभिभावक तीनों जिम्मेदार हैं। वीणा पाणि इंटर कॉलेज के शिक्षक हरीश कुमार कहते हैं कि दूसरे विषयों की तरह हिंदी में भी स्टेप मार्किंग की व्यवस्था हो। दुर्गा इंटरमीडिएट कॉलेज के शिक्षक हरिकेश सिंह ने कहा कि बच्चे अधिकतर गणित और विज्ञान को वरीयता देते हैं। इससे हिंदी कहीं न कहीं पीछे होती जा रही है।
छात्राएं शालिनी शर्मा, रचना और हर्षिता मिश्रा कहती हैं कि अभिभावक बच्चों को गणित, भौतिकी, रसायन आदि के लिए प्रेरित करते हैं, किंतु हिंदी के लिए नहीं। अंग्रेजी का बढ़ता प्रचलन भी कहीं न कहीं हिंदी को प्रभावित कर रहा है। छात्र ट्विंकल मोदनवाल, रीतेश गुप्ता और आदर्श यादव कहते हैं कि अन्य विषयों की अपेक्षा हिंदी का पेपर बहुत लंबा होता है। कंप्टीशन में भी विज्ञान, गणित जैसे विषयों से ज्यादा सवाल आते हैं, जिससे सारा ध्यान इन्हीं विषयों पर लगा रहता है। छात्र अभिषेक और सुहैल खान ने कहा कि अन्य विषयों की तरह हिंदी के प्रति भी विद्यार्थियों को ध्यान देना चाहिए।
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