रायबरेली। न शोर शराबा, न चुनावी रथ। लाउडस्पीकर की आवाज भी नहीं। मंच से गरजते स्टार प्रचारकों के तीखे बोल भी नदारद। ये सब चुनावी मौसम में गर्मी पैदा करते थे, लेकिन इस बार शहर हो या फिर गांव की गलियां।
हर तरफ सन्नाटा दिख रहा है। विधानसभा चुनाव-2022 में कोरोना की गाइडलाइन ने ऐसी पाबंदी लगाईं कि उम्मीदवार भी पशोपेश में हैं। समय कम है और जनसंपर्क ज्यादा करना है।
ऐसे में कौन सा मैजिक चलाएं कि मतदाता खिंचे चले आएं। प्रमुख दलों के प्रत्याशियों की चाहत है कि स्टार प्रचारक उनके पक्ष में माहौल बनाएं।
लेकिन अभी तक उनके अरमानों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। वजह अभी तक ऐसा कोई स्टार प्रचारक नहीं आया है, जिसने किसी भी दल के उम्मीदवार के पक्ष में जिताऊ माहौल बनाया हो।
पिछले लोकसभा या फिर विधानसभा चुनाव पर नजर डालें तो प्रमुख दलों के स्टार प्रचारकों की जनसभाएं होती थीं। जातीय समीकरण बैठाने के लिए नुक्कड़ सभा कर माहौल बनाया जाता था, लेकिन इस बार कोरोना की वजह से ऐसी पाबंदियां लगीं कि प्रत्याशी को वोटरों के घर-घर जाना पड़ रहा है, जबकि पहले स्टार प्रचारक हर विधानसभा क्षेत्र में जनसभाएं करके अपना संदेश दे देते थे, लेकिन इस बार का प्रचार पिछले सालों की तुलना में जुदा है। उम्मीदवार चाहते हैं कि जनसभाओं की छूट मिले और स्टार प्रचारक जिले में आएं।
भाजपा उम्मीदवार चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह उनके क्षेत्र में सभा कर दें, जिससे मतदाताओं को अपनी ओर मोड़ा जा सके।
वहीं सपा के उम्मीदवार अपने मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो बसपा उम्मीदवार पूर्व मुख्यमंत्री बहन मायावती की सभा कराना चाहते हैं। कांग्रेस प्रत्याशियों की चाहत है कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी उनके पक्ष में दौरा कर दें।
जैसे-जैसे मतदान की तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ती जा रहीं हैं। लेकिन अभी तक किसी बड़े नेता के जिले के दौरे का कार्यक्रम नहीं आया है, जबकि चुनाव के सिर्फ 12 दिन बचे हैं। ऐसे में भाजपा, सपा, कांग्रेस और बसपा के उम्मीदवारों में स्टार प्रचारकों के न आने से बेचैनी है। एक-दो दिन में किसी न किसी बड़े नेता के आने की उम्मीद जरूर जताई जा रही है।
...चिंता इसलिए भी ज्यादा
इस विधानसभा चुनाव में कई उम्मीदवार ऐसे हैं, जो दल बदलकर आए हैं। 2017 के चुनाव में वे किसी और दल में थे और इस बार किसी और दल से मैदान में हैं। सवाल उठ रहा है कि नेताओं ने तो आस्था बदल ली है। क्या कार्यकर्ताओं ने भी उनके साथ अपनी आस्था बदली है। यदि नहीं बदली है तो जिस दल में नेताजी गए हैं, वहां के कार्यकर्ता उनके बारे में क्या सोचते हैं और उनके प्रति उनका रुख क्या है। इसको लेकर भी दल बदलने वाले नेताओं की चिंता है। इस बार कोई सीट नहीं है, जहां नेताओं ने दल न बदले हों या फिर कोई बाहर से न आया हो। अब वोटर या फिर कार्यकर्ता प्रत्याशियों को किस नजर से देखता है और उसके लिए कितना समर्पित हो पाता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।