नाम श्रद्धा, उम्र महज 11 वर्ष और हौसले पहाड़ से भी ऊंचे। नन्हीं जलपरी के नाम से चर्चित कानपुर की बेटी श्रद्धा शुक्ला मंगलवार सुबह आठ बजे डलमऊ घाट से ऊंचाहार के लिए रवाना हुई। नन्हीं जलपरी का मानना है कि अगर लोग अपनी बेटियों को बचपन से ही उत्साहित करें तो वह किसी भी हाल में बेटों से कम नहीं होती।
इसके पूर्व उसने डलमऊ के डल पार्क में रात्रि विश्राम किया। यहां बातचीत के दौरान श्रद्धा ने बताया कि वह गिनीज बुक में अपना नाम दर्ज कराकर देश का नाम ऊंचा करना चाहती है। उसने बताया कि उसे लहरों से लड़ने का हुनर बाबा मुन्नू लाल शुक्ला से मिला है।
वहीं पिता ललित कुमार और मां वंदना ने न सिर्फ उत्साह बढ़ाया बल्कि सहयोग भी कर रहे हैं। वह अब तक जो कुछ भी कर पाई है, इन लोगों से मिले उत्साह की बदौलत की कर पाई है। 28 अगस्त से गंगा की लहरों को चीरते हुए ऊंचाहार पहुंची।
कानपुर से 570 किलोमीटर की दूरी तय कर वाराणसी पहुंचने का जज्बा लिए श्रद्धा जब डलमऊ से रवाना हुई तो बड़ी संख्या में लोगों ने उसे विदाई दी। रवानगी से पूर्व श्रद्धा ने मां गंगा की आरती भी की।
बाढ़ के चलते उफनाती गंगा की लहरों को चीरते हुए जलपरी श्रद्धा जैसे ही शाम छह बजे डलमऊ पहुंची, तमाम लोगों की भीड़ उसके स्वागत के लिए घाट पर पहुंच गई। श्रद्धा ने यहां पूरे ग्रुप के सदस्यों के साथ डलमऊ के डल पार्क में रात्रि विश्राम किया।
रात्रि विश्राम के बाद मंगलवार सुबह आठ बजे रवाना होने से पूर्व उसने मां गंगा की आरती की। इस दौरान मौजूद क्षेत्र के तमाम लोगों ने उसे सफल होने का आशीर्वाद दिया। दोपहर ढाई बजे करीब जलपरी ऊंचाहार के कल्यानी गांव के पास गंगा तट पहुंची।
वहां ग्राम प्रधान धनराज यादव के साथ उसके स्वागत के लिए खड़े लोगों ने हर-हर गंगे के जयकारे के साथ उसका स्वागत किया। 15 मिनट यहां रुकने के बाद जलपरी श्रद्धा आगे के लिए रवाना हुई। जलपरी के पिता ने बताया कि उनका अगला विश्राम स्थल कड़ा मानिकपुर घाट होगा।
नन्हीं जलपरी श्रद्धा ने स्थानीय प्रशासन से कुछ नाराज नजर आई। बकौल श्रद्धा स्थानीय लोगों ने तो उसका भरपूर उत्साह बढ़ाया, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई खास महत्व नहीं मिला। पिता ललित ने बताया कि इसके पूर्व उनकी टीम ने जहां-जहां विश्राम किया है।
स्थानीय प्रशासन के अधिकारी आते रहे हैं। सबने उनकी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखा। यहां कोई नहीं आया, बावजूद इसके उनके दिल में प्रशासन के प्रति कोई मैल नहीं है। श्रद्धा अपना लक्ष्य अवश्य पूरा करेगी। कोई भी परेशानी उसकी राह का रोड़ा नहीं बन सकती। हम सब उसके साथ ही चल रहे हैं।
जलपरी के पिता ललित कुमार शुक्ला का कहना है कि श्रद्धा का ढाई साल की उम्र से तैराकी से नाता है। उन्होंने बताया कि श्रद्धा के बाबा मुन्नू लाल शुक्ला जब गंगा में नहाने जाते थे तो वे उसको भी अपने साथ ले जाते थे।
इसी दौरान श्रद्धा तैराकी में धीरे-धीरे दिलचस्पी लेने लगी और कुछ ही महीनों में एक कुशल तैराक बन गई। इससे पहले श्रद्धा कानपुर से इलाहाबाद तक की 270 किलोमीटर की दूरी को तैर कर पार कर चुकी है। इस समय उसकी उम्र 11 साल है और वह कक्षा नौ की छात्रा है।