वाराणसी जेल में हुए बवाल के बाद एक बार फिर जेल की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हैं। रायबरेली जिला कारागार में हालात बिगड़ जाएं तो यहां पर भी बंदियों को संभालना मुश्किल हो जाएगा। क्षमता से अधिक बंदी हैं और सुरक्षा नाकाफी है।
स्टाफ और संसाधन की कमी अरसे से चली आ रही है, जिसको लेकर अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे हैं। यह हाल तब है, जब कई बार बंदियों और जेल कर्मियों के बीच बवाल भी हो चुका है।जिला कारागार में 680 बंदियों को रखने की क्षमता है। मौजूदा समय की बात करें तो यहां पर 830 बंदी हैं।
बंदियों की संख्या अधिक होने के कारण अक्सर यहां पर बंदियों और जेल कर्मियों के बीच टकराव होता रहता है। खासकर स्टाफ और संसाधन की कमी से जेल की सुरक्षा रामभरोसे है। यहां पर 52 बंदी रक्षकों के सापेक्ष 37 की तैनाती है।
यही नहीं डिप्टी जेलर के पांच पद हैं। इसमें दो डिप्टी जेलर की ही तैनाती है। सुरक्षा के मद्देनजर मोबाइल जैमर की कौन कहे, यहां पर वाच टॉवर और सर्च लाइट तक की भी व्यवस्था नहीं है। बिल्डिंग की दशा दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। विभाग के पास बैरकों की मरम्मत के लिए बजट तक नहीं है।
बंदियों की मनमानी का विरोध करने पर यहां पर जेल कर्मियों को जान से हाथ धोना पड़ा है। 8 मार्च 2010 दिन रविवार रात करीब 12 बजे एक सनसनीखेज घटना में जेल अधीक्षक आवास पर सुरक्षा ड्यूटी पर तैनात बंदी रक्षक मंशाराम (50 वर्ष) की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
वारदात को बाइक सवार दो युवकों ने अंजाम दिया। वर्ष 2005 में बंदीरक्षक राम आसरे को गोली मार दी गई थी, जो इलाज के बाद बच गया था। इसमें बंदीरक्षक की एक कैदी के साथ कड़ाई से पेश आने के चलते घटना को अंजाम दिया गया था।
आठ महीने पहले जेलर पर जानलेवा हमला बोल दिया था। यह वह घटनाएं हैं, जो रिकॉर्ड में दर्ज हैं। आए दिन बंदियों और जेल कर्मियों के बीच कहासुनी की नौबत रहती है। जेल अधीक्षक अमिता दुबे का कहना है कि जेल की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
क्षमता से अधिक बंदी तो बंद हैं, लेकिन उन्हें काबू में रखा जाता है। स्टाफ और संसाधन की कमी को पूरा करने के लिए उच्चाधिकारियों को लिखापढ़ी की गई है। यहां पर सब कुछ सामान्य है।