दरअसल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट पारंपरिक रूप से कांग्रेस के वोटर हुआ करते थे। लेकिन 1996 में जाट नेता चौधरी अजित सिंह ने लोकदल की एतिहासिक विरासत और पिता चौधरी चरण सिंह के नाम को लेकर राष्ट्रीय लोकदल का गठन किया और उसके बाद जाट उनके साथ जुड़ गए। वर्ष 2013 में एक विवाद के बाद जाट सांप्रदायिक आधार पर बंट गए और माना जाता है कि उन्होंने 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में भाजपा को वोट दिया।
लेकिन जाट पूरी तरह कृषि से जुड़े समाज के रूप में देखे जाते हैं। कृषि ही उनका मुख्य पेशा माना जाता है। कृषि कानूनों पर उपजे आक्रोश के बाद माना जा रहा है कि जाट भाजपा से नाराज हैं और एक बार फिर वे आरएलडी (समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन) की तरफ वापस जा सकते हैं। राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम से विश्वविद्यालय का गठन जाटों की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।