आमतौर पर एक बार चुना गया जनप्रतिनिधि जब अगली बार चुनाव में जाता है तो उसकी माली हैसियत पहले बेहतर ही होती है लेकिन बरेली से सांसद प्रवीण सिंह ऐरन का मामला उलटा है। सांसद बनने के बाद उनकी आय और अन्य सम्पत्तियों में कमी आई है।
ऐरन के मुताबिक सांसद बनने के बाद सामाजिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें पांच मकान और पांच वाहनों को बेचना पड़ा। यही नहीं 2004 के बाद से उन्होंने कोई नयी सम्पत्ति नहीं खरीदी। सांसद ने लोकसभा अध्यक्ष को भेजे अपनी आय व सम्पत्ति के ब्यौरे में ये जानकारियां दी हैं।
सांसद ने दिया सम्पत्ति का ब्यौरा
अपने वार्षिक आय व सम्पत्ति ब्यौरे में सांसद ने बताया है कि वर्ष 2004 से 2008 तक की 3,47,81,954 की आय पर उन्होंने 1.12 करोड़ से अधिक का टैक्स दिया। जबकि 2009 में सांसद बनने के बाद 2013 तक 89 लाख रुपए ही टैक्स के तौर पर चुकाए। वर्ष 2007 में सांसद बनने से पहले तक उनकी सालाना आय 90.83 लाख रुपए से अधिक थी और उनकी कुल सम्पत्तियां 33 करोड़ रुपए से अधिक थीं।
वर्ष 2013 में उनकी आय घट गई। इस साल उनकी वार्षिक आय 56.86 लाख रुपए ही हुई। वहीं कुल सम्पत्तियां भी घट कर 28.87 करोड़ पर आ गईं। 2009 से 2013 तक सांसद को अपने सामाजिक, राजनीतिक और दान आदि के लिए खर्च जुटाने को अपनी 4.14 करोड़ रुपए से अधिक की सम्पत्तियों व वाहनों को बेचना पड़ा। इन सालों में उन्होंने लोन लेकर केवल एक ट्रैक्टर खरीदा। यही नहीं 2009 में उनके पास 17.98 लाख रुपए बैंक बैलेंस था जो अब घटकर 4.34 लाख रुपए ही बची।
'पत्नी और पुत्रियों ने भी सम्पत्ति नहीं खरीदी'
सांसद की पत्नी और पूर्व मेयर सुप्रिया ऐरन के अलावा उनकी दो विवाहित पुत्रियों ने भी उनके सांसद कार्यकाल में कोई सम्पत्ति नहीं खरीदी है। इन सालों में सांसद ऐरन ने अपनी ही कुछ कंपनियों के शेयर खरीदे हैं। इसके अलावा बरेली में अपनी ही कम्पनी के आवासीय प्रोजेक्ट में 1.40 करोड़ रुपए का निवेश किया है। यह धनराशि भी बेची गई संपत्तियों से अर्जित की गई थी।
इस बारे में सांसद ने बताया, 'वर्तमान लोकसभा का संभवत: यह अंतिम सत्र होगा। इसलिए मैने लोकसभा अध्यक्ष को अपनी सम्पत्तियों का ब्यौरा भेजा है। सांसद बनने के बाद सम्पत्तियों और आय में कमी आई है। चूंकि मैं सामाजिक-राजनीतिक कार्यों में अधिक व्यस्त हो गया इसलिए अपने प्रोफेशन पर सीमित समय ही दे सका। इन कारणों से आय में कमी हुई है। साथ ही सामाजिक जिम्मेदारियों, राजनीतिक खर्चों और दान आदि के खर्च बढ़ें हैं।'