प्यासे लोग ही नहीं पेड़ पौधे भी हैं। इसका असर आम की बागों पर साफ देखा जा रहा है। तेज धूप के कारण बागों की नमी चली गई है। इसके चलते पेड़ों पर आई अमियां लगातार गिरती जा रही हैं। हर बार नहरों में आने वाले पानी के कारण बागों की सिंचाई हो जाती थी लेकिन इस बार नहरों में धूल उड़ रही है। इससे आम के बागवानों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं। कुंडा, मानिकपुर में आम के बागों की भरमार है। यही कारण है कि इसे फलपट्टी क्षेत्र घोषित किया गया है। यहां के आम पूरे देश में सप्लाई किए जाते हैं। इन बागों के सिंचाई का माध्यम नहरें हैं जिनके माध्यम से बागों की प्यास बुझती है। इस बार नहरों में पानी की जगह धूल उड़ रही है। तिवारीपुर माइनर, हथिगवां माइनर, बरई माइनर, मानिकपुर माइनर के साथ ही शारदा सहायक नहर में भी पानी की नहीं है। बड़ी नहर में पानी न होने से छोटी नहरों में भी पानी नहीं है।
नहरों से ही चलने वाले नाले भी सूखे पड़े हैं। इसके चलते बाग भी सूखे पड़े हैं। तालाबों में भी पानी न होने के कारण बागों की सिंचाई पंप से भी नहीं हो पा रही है। अप्रैल माह में तेज धूप के साथ पड़ रही गर्मी से नमी नीचे चली जा रही है। इसका असर पेड़ों पर पड़ रहा है। आम के पेड़ पानी की कमी के कारण सूखने की कगार पर पहुंच रहे हैं। पेड़ों पर लगे टिकोरे अपने आप नीचे गिर जा रहे हैं। बागवानों का कहना है कि अगर ऐसा ही हाल कुछ दिन और रहा तो आम बेचने की तो कौन कहे इस बार खाने को भी नहीं मिलेगा। कई वर्षों से लगातार वर्षा न होने के कारण भी बागों की नमी खत्म हो गई है। जलस्तर नीचे जाने के कारण नमी भी जल्दी ही चली जाती है। ऐसे में लगातार बागों की सिंचाई की जरूरत पड़ती है। पेड़ों में फल आने पर अगर पानी समय से नहीं मिलता पेड़ों की क्षमता घटने लगती है। यही कारण है कि टिकोरे अपने आप गिरने लगते हैं और बागों की उत्पादन क्षमता कम हो जाती है।