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बेल्हा की सियासत में सिरमौर बनकर उभरे राजाभैया

Thu, 07 Jan 2016 11:10 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, प्रतापगढ़
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जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में मिली एकतरफा जीत से राजाभैया ने साबित कर दिया कि जिले की राजनीति में उनका कोई सानी नहीं है। यह राजाभैया के प्रयासों का ही नतीजा था कि उनके और सपा द्वारा समर्थित प्रत्याशी उमाशंकर यादव ने इतिहास रच दिया। बेल्हा में जिला पंचायत के इतिहास में वोटों के लिहाज से यह अब तक की सबसे बड़ी जीत है। विरोधी कहीं भी मुकाबले में नजर नहीं आए। अध्यक्ष का चुनाव पूरी तरह से एकतरफा हो गया। राजाभैया समर्थित उमाशंकर यादव को जहां 55 वोट मिले वहीं निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष प्रमोद मौर्य मात्र छह वोट ही पा सके। जिला पंचायत अध्यक्ष के बीते चुनावों में सारे दल राजाभैया को रोकने के लिए एक हो जाते थे, लेकिन इस बार राजाभैया ने ऐसा दांव चला कि प्रमोद मौर्य के पक्ष में विपक्षी दल एकजुट नहीं हो सके और उन्हें इतनी करारी हार का सामना करना पड़ा।
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यूं तो जिला पंचायत सदस्य के चुनाव के दौरान ही ग्यारह जिला पंचायत सदस्यों को निर्विरोध निर्वाचित कराकर राजाभैया ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे। उन्होंने साफ कर दिया था कि वह हर हाल में जिला पंचायत पर कब्जा करना चाहते हैं। चुनाव में उनके समर्थकों के जीतने के बाद उनके खेमे में कुल समर्थकों की संख्या 24 हो गई थी। उन्हें मात्र सात और जिला पंचायत सदस्यों के वोट की जरूरत थी। ऐसे में यह माना जाने लगा था कि इस बार बोर्ड राजाभैया का ही बनेगा, लेकिन परिणाम एकतरफा होने की उम्मीद किसी को नहीं थी। निवर्तमान अध्यक्ष प्रमोद मौर्य और उनके चाचा बसपा के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के कद को देखते हुए जिले के सियासी पंडित यह अनुमान लगा रहे थे कि वह आसानी से हथियार नहीं डालेंगे और कड़ी टक्कर देंगे। चुनाव के नतीजे आने के बाद सारे कयास और अनुमान धरे के धरे रह गए। 61 जिला पंचायत सदस्यों में से 55 ने उमाशंकर यादव के पक्ष में मतदान कर राजाभैया का इकबाल बुलंद कर दिया।


उमाशंकर यादव को अध्यक्ष बनाकर राजाभैया ने चौथी बार जिला पंचायत पर कब्जा जमाया है। इससे पहले वह तीन बार अपना बोर्ड गठित करा चुके थे, जबकि एक बार उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। वर्ष 2011 में प्रमोद मौर्य राजाभैया समर्थित प्रत्याशी घनश्याम यादव को हराकर जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे। इससे पहले लगातार तीन बार बोर्ड पर राजा समर्थकों का ही कब्जा रहा। पहली बार 1995 में राजा समर्थित अमरावती सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष बनी थीं। 2000 में फिर राजाभैया का ही डंका बजा और विंध्येश्वरी प्रसाद पटेल जिला पंचायत अध्यक्ष बने। फिर 2005 में राजा के सहयोग से ही कमला देवी ने अध्यक्ष पद पर जीत हासिल की।
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जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव को लेकर महीने भर से चल रही सरगर्मी बृहस्पतिवार को परिणाम आते ही शांत हो गई। जोड़तोड़ और जिला पंचायत सदस्यों को अपने पाले में करने के लिए मची खींचतान पर भी विराम लग गया। राजाभैया समर्थित प्रत्याशी उमाशंकर यादव की जीत के साथ विपक्षियों के हौसले टूट गए। उम्मीद जताई जा रही थी कि दोनों के बीच कड़ा मुकाबला होगा, लेकिन विरोधी खेमा चुनाव मैदान में पूरी तरह से चित्त हो गया। 55 के मुकाबले मात्र छह वोट ही विपक्ष की तरफ पड़े। इसमें से एक वोट खुद प्रमोद मौर्य का ही था। जीत के अंतर ने यह साबित कर दिया कि चुनाव पूरी तरह से एकतरफा हो गया था। 
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