अमर उजाला के 'सत्ता का संग्राम' कार्यक्रम के तहत प्रतापगढ़ में एमडीपीजी कॉलेज के पास युवा संवाद का आयोजन किया गया। युवा चुनाव को लेकर क्या विचार रखते हैं और उनके क्या मुद्दे हैं इस पर अमर उजाला की टीम ने बाचतीच की। जिसमें अधिकांश युवाओं ने कहा कि सरकार को मुफ्त राशन के स्थान पर बच्चों को सस्ती और मुफ्त शिक्षा, कोचिंग देने पर विचार करना चाहिए।
अमर उजाला के 'सत्ता का संग्राम' कार्यक्रम के तहत प्रतापगढ़ में एमडीपीजी कॉलेज के पास युवा संवाद का आयोजन किया गया। इसमें युवाओं में बेरोजगारी, आरक्षण और महंगी शिक्षा का दर्द दिखा। अधिकांश युवाओं ने कहा कि सरकार को मुफ्त राशन के स्थान पर बच्चों को सस्ती और मुफ्त शिक्षा, कोचिंग देने पर विचार करना चाहिए। अच्छी शिक्षा मिलने पर वह अपने लिए रोटी की व्यवस्था खुद कर लेंगे। सरकार मुफ्त में राशन बांटकर लोगों को पंगु बनाने का कार्य कर रही है। मुफ्त में अनाज मिलने के कारण लोग आलसी हो गए हैं न तो मजदूरी करना चाहते हैं न ही नौकरी करना चाहते हैं। तमाम गरीब परिवार तो ऐसे हैं जो मुफ्त का राशन बेचकर मादक पदार्थों का सेवन कर रहे हैं।
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एमडीपीजी कॉलेज की छात्रा ऊषा देवी ने कहा कि सरकार को शिक्षा फ्री कर देनी चाहिए। बाकी सुविधाओं में सरकार भले ही कटौती कर दे लेकिन बच्चों को सस्ती शिक्षा मुहैया कराने की व्यवस्था होनी चाहिए। आज गरीब के बच्चे नहीं पढ़ पा रहे हैं। शिक्षा मिलने से लोगों के अंदर जागरूकता आएगी और देश तरक्की करेगा। मुफ्त का राशन खाने से जनता पंगु हो जाएगी और इसकी आदत देश को पीछे ले जाने का कार्य करेगा। दुर्भाग्य की बात है कि कई राजनीतिक दलों के एजेंडे में रोजगार और सस्ती शिक्षा पर जोर नहीं है।
एमए हिंदी की छात्रा शिखा मिश्रा ने कहा कि सस्ता राशन देने के स्थान पर उसका पैसा संबंधित राशन कार्ड धारक के खाते में डाल देना चाहिए, ताकि इस पैसे का दूसरे कामों में किताब खरीदने और फीस भरने या दवा आदि के लिए काम आ सके। एक युनिट पर पांच किलो राशन मिल रहा है। खर्च कम हो पाता है। इसके कारण लोग राशन बेच रहे हैं।
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युवाओं ने कहा कि प्राइवेट स्कूलों में किताबें इतनी महंगी हो गई हैं कि आम आदमी की जेब ढीली हो जा रही है। एनसीईआरटी की एक किताब सौ रुपये के अंदर मिलती है, लेकिन दूसरे बोर्ड की वही किताब की कीमत पांच सौ रुपये से ज्यादा है। बीएससी की छात्रा स्नेहा मिश्रा ने कहा कि सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के कारण बच्चों को पढ़ने का मौका नहीं मिलता है और परीक्षाएं सिर पर आ जाती हैं।