संवाद न्यूज एजेंसी
प्रतापगढ़। डॉ.सोने लाल पटेल मेडिकल कॉलेज में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को महंगी-मंहगी दवाओं के साथ इंजेक्शन तक खरीदकर लानी पड़ रही है। एक रुपये वाले पर्चे पर सरकारी जबकि छोटी सी पर्ची पर डॉक्टर बाहर की दवा लिख रहे हैं।
यह तब, जब शासन मरीजों को सभी दवाएं अस्पताल से मुहैया कराने का दावा करता है। गंभीर या असाध्य बीमारियों के इलाज में तो निजी अस्पताल की तरह मीटर चलता है।
यहां डॉक्टरों से इलाज कराने में फीस नहीं देनी पड़ती। सर्जिकल वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों से दो से ढाई हजार रुपये की दवाएं मंगवा ली जाती हैं।
बुधवार को अमर उजाला की पड़ताल में हैरान कर देने वाली स्थिति सामने आई। मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर ओपीडी के पर्चे पर जहां दो से तीन दवा लिखकर मरीजों को अंदर से लेने की बात कह रहे थे, वहीं एक छोटी सी पर्ची पर हजार से दो हजार रुपये तक की बाहर की दवाएं लिखकर थमा रहे थे।
इतना ही नहीं मरीज कहीं किसी दूसरी कंपनी की दवा न खरीद लें, इसलिए डॉक्टर देखने के लिए मरीजों को बुलाया करते हें। इसके अलावा मरीजों को अल्ट्रासाउंड जांच कराने के लिए बहुत परेशानी झेलनी पड़ती है।
मेडिकल कॉलेज में एक दिन में चार डॉप्लर जबकि 40 साधारण अल्ट्रासाउंड होते हैं। जबकि प्रतिदिन डेढ़ से दो सौ मरीज अल्ट्रासाउंड कराने के लिए पहुंच रहे हैं। ऐसे में अल्ट्रासाउंड जांच के लिए दो से तीन सप्ताह बाद नंबर मिलता है। इससे मरीजों को परेशान होना पड़ रहा है।
विवश होकर प्राइवेट सेंटर पर जाना पड़ता है। लालगंज से आई रेखा ने कहा, महिला अस्पताल की डॉक्टरों ने अल्ट्रासाउंड कराकर रिपोर्ट दिखाने के लिए कहा है। यहां डॉक्टर दो सप्ताह बाद जांच के लिए बुलाते हैं। ऐसे में लौटना पड़ रहा है।
-क्या बोले मरीज
नाम का सरकारी अस्पताल है। प्राइवेट से ज्यादा इलाज में खर्च आ रहा है। एक घंटे लाइन में भी लगना पड़ रहा है। इससे बेहतर तो प्राइवेट अस्पताल हैं। सर्दी जुकाम और बुखार का इलाज कराने आया था, डॉक्टर ने तकरीबन एक हजार रुपये की दवा बाहर से लिख दी।
- मिथलेश कुमार, रानीगंज
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मेरे कान में दिक्कत है। डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने सरकारी अस्पताल के साथ ही बाहर की महंगी दवाएं भी लिख दीं। बाजार से खरीदने के लिए एक छोटी सी पर्ची थमा दी। जनऔषधि केंद्र पर गया तो वहां से लौटा दिया गया। गेट पर खुले मेडिकल स्टोर संचालक ने बताया कि सप्ताह भर की दवा ढाई हजार रुपये की आएगी। कान में पर्दे की सूजन की दवा है।
अधिवक्ता देश राज पाल
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हाथ में चोट लग गई थी। पट्टी बदलवाने आया हूं। मेरे पास पैसा भी नहीं है। डॉक्टर बाजार से दवा खरीदकर खाने के लिए बोल दिए हैंं।
देवदत्त शर्मा, पट्टी
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सरकारी अस्पताल से बेहतर तो झोलाछाप डॉक्टर हैं। सस्ते में अच्छी तरह से इलाज कर ठीक भी कर देते हैं। मेडिकल कॉलेज का जिस तरह नाम बड़ा है, ठीक उसी तरह यहां इलाज भी महंगा हो गया है। डॉक्टर ज्यादातर बाहर की दवाएं लिख रहे हैं।
उमेेश चंद्र दूबे, भंगवा
मेडिकलक कॉलेज के डॉक्टर मरीजों को बाहर की दवा नहीं लिख सकते हैं। जो दवा नहीं है और बहुत जरूरी समझते हैं, उन्हीं दवाओं को प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र से मंगाने के लिए कह सकते हैं। बाहर की दवा लिखते पाए जाने पर डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
डॉ.सुरेश सिंह, सीएमएस, मेडिकल कॉलेज