इंदिरा गांधी की सभा से मुनीश्वदत्त को मिली हार
वर्ष 1971 के लोकसभा चुनाव में प्रतापगढ़ में कांग्रेस की नाव मझधार में फंसी थी। कांग्रेस से पूर्व विदेश मंत्री स्व. राजा दिनेश सिंह मैदान में थे। टिकट न मिलने पर कांग्रेस के ही जमीनी नेता मुनीश्वरदत्त उपाध्याय ने पार्टी से बगावत कर दी थी।
टिकट न मिलने के कारण यहां की जनता की भी मुनीश्वरदत्त के प्रति सहानुभूति थी, लेकिन चुनाव से ठीक दो दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रामलीला मैदान में जनसभा से जिले की सियासी लहर बदल दी। उनकी अपील का ऐसा असर हुआ कि लोग मुनीश्वरदत्त के बजाए राजा दिनेश सिंह के साथ चले गए और आखिरकार उन्हें जीत हासिल हुई। मुनीश्वरदत्त को 80,186 मत से करारी हार का सामना करना पड़ा।
एक समय था जब मुनीश्वरदत्त उपाध्याय की जिले में ही नहीं बल्कि संसद में भी तूती बोलती थी। जिले के पहले सांसद, पहले जिला पंचायत अध्यक्ष बनने वाले अधिवक्ता ने शायद यह कभी नहीं सोचा था जिस पार्टी में उनकी इजाजत के बगैर पत्ता नहीं हिलता था, उससे उनका ही टिकट कट जाएगा।
वर्ष 1971 के चुनाव में टिकट नहीं मिलने के बाद कांग्रेस को सबक सिखाने और राजा दिनेश सिंह को हार का मुंह दिखाने के लिए सभी दलों से मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा। राजा दिनेश सिंह के विदेश मामलों को लेकर प्राय: बाहर रहने से नाराज बेल्हा की जनता का रुझान मुनीश्वरदत्त उपाध्याय की तरफ था। राजा दिनेश सिंह के माध्यम से जब इस बात की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हुई, तो वह चुनाव के दो दिन पहले ही शहर के रामलीला मैदान में जनसभा करने आ गईं।
उन्होंने कहा कि यहां के लोगों का एक-एक मत उनके ऊपर कर्ज होगा। यह जीत राजा दिनेश सिंह की नहीं, बल्कि हमारी होगी। बेल्हावासियों से विकास का वादा करके दिनेश सिंह के लिए वोट मांगा। फिर क्या था, रातोंरात राजा दिनेश सिंह के पक्ष में हवा बदली और मुनीश्वर दत्त उपाध्याय को करीब 80,186 मतों से हार का सामना करना पड़ा। राजा दिनेश सिंह को तकरीबन 1,56,902 और मुनीश्रदत्त को लगभग 76,716 मत मिले थे।