‘लोग कहते हैं इस शहर की पहचान हूं मैं, ऐ मेरे गांव तेरी मिट्टी पे कुर्बान हूं मैं। तेरी मासूम सी इस गोद ने पाला है मुझे, ठोंकरे जब भी लगी तूने संभाला है मुझे। मैं कहीं भी रहूं हर सांस यहां रहती है, ये दयार वो है जहां पर मेरी मां रहती है। इसकी खातिर तो वही छोटा सा इमरान हूं, ऐ मेरे गांव तेरी मिट्टी पे कुर्बान हूं मैं....।’
इमरान प्रतापगढ़ी हिंदी और उर्दू की इसी मिलीजुली जुबान के कारण जाने जाते हैं। यही वो जुबान है जिसने उनको ऐसी शख्सियत बना दिया जिसे सुनने के लिए हजारों की भीड़ जुट जाती है। उर्दू और हिंदी की जुगलबंदी के साथ इमरान ने मुशायरे की दुनिया को नई ऊंचाइयां दीं। नई पहचान बनाई। अपनी नज्मों से देश-विदेश में धाक जमाई। साहित्य के क्षेत्र पूरी तरह बंजर हो चुकी बेल्हा की जमीन से पहली बार ऐसा सितारा निकला जिसकी प्रतिभा को सलाम करते हुए सरकार ने प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार यश भारती से सम्मानित करने का फैसला किया है। उनकी इस उपलब्धि से न सिर्फ जिले का मान बढ़ा है बल्कि साहित्य-कला और संस्कृति के क्षेत्र में दशकों से बना खालीपन भी दूर हुआ है।
06 अगस्त 1987 को प्रतापगढ़ जिले के चमरूपुर शुक्लान शमशेरगंज में जन्मे इमरान प्रतापगढ़ी का वास्तविक नाम मोहम्मद इमरान खान है। इनके पिता डाक्टर हैं तो मां एक गृहणी। इमरान के परिवार का साहित्य से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। गजल-नज्म और मुशायरे जैसे शब्द किसी के जेहन में भी नहीं थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद वह अवधि के कवि स्व. आद्या प्रसाद मिश्र उनमत के संपर्क में आए। बस यहीं से गजलों और मुशायरों की दुनिया में उनका नाम होने लगा। केपी इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और प्रसिद्ध साहित्यकार लाल बहादुर सिंह ने भी उनका मार्गदर्शन किया। 28 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उन्होंने वह मुकाम हासिल कर लिया जिसके लिए लोगों को ताउम्र इंतजार करना पड़ता है। यश भारती पुरस्कार मिलते-मिलते आम तौर ज्यादातर लोगों के पैर कब्र में लटके होते हैं, लेकिन इमरान को शुरुआती सफर में ही सरकार ने इस पुरस्कार से नवाजा है।
देश में अलग-अलग जगहों के अलावा वह एक दर्जन से भी ज्यादा देशों में एकल काव्यपाठ कर चुके हैं। उनको यश भारती पुरस्कार से नवाजे जाने पर वरिष्ठ शायर दीपक रूहानी कहते हैं कि सरकार ने अदब के शायर को उसी रुतबे से नवाजा है जिसके वह सही मायने में हकदार थे। यह सिर्फ इमरान का नहीं बल्कि पूरे जिले का सम्मान है। खुद इमरान कहते हैं कि देश-प्रदेश में काव्यपाठ के दौरान लोग ये जुमला कसते थे कि प्रतापगढ़ से भी साहित्यकार और शायर निकलने लगे हैं क्या? अब इस पुरस्कार से उनकी यह धारणा बदलेगी। अपराध और गुंडई के लिए बदनाम जिले को नई पहचान मिलेगी। शायर राजमूर्ति सिंह सौरभ कहते हैं कि इमरान की शोहरत का असर यहां की नई पीढ़ी पर पड़ेगा और उनकी सोहबत बदलेगी। वरिष्ठ कवि अनीस देहाती का कहना है कि मृत हो चुकी साहित्य की मिट्टी फिर से उपजाऊ होगी और एक नई पौध तैयार होगी।