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डॉक्टरों को रास नहीं आ रहा सरकारी अस्पताल

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प्रतापगढ़। डॉक्टरों को सरकारी अस्पताल रास नहीं आ रहे हैं। सरकारी नौकरी छोड़कर वह प्राइवेट अस्पताल ज्वाइन कर रहे हैं या फिर खुद का अस्पताल खोल रहे हैं। पांच साल के भीतर जिले के सरकारी अस्पतालों में तैनात 17 डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ दी। नए डॉक्टर अस्पताल में ज्वाइन तो करते हैं, मगर कुछ ही दिन टिक पाते हैं। इससे सरकारी अस्पतालों में दिनोंदिन चिकित्सकों की कमी बढ़ती जा रही है।
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जिला अस्पताल में चिकित्सकों के कुल 26 पद स्वीकृत हैं, मगर तैनाती 23 की है। इनमें ज्यादातर सर्जन हैं। हर्ट, चेस्ट फिजीशियन और चर्म रोग के डॉक्टर की तैनाती ही नहीं की गई है। महिला अस्पताल में 11 डॉक्टर होने चाहिए, मगर इन दिनों महज छह डॉक्टर की तैनाती की गई है।
सीएमओ के अधीन 261 चिकित्सकों के पद स्वीकृत हैं, मगर तैनाती 190 डॉक्टरों की ही हुई है। डॉक्टरों की कमी के चलते मरीजों को परेशान होना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड पर गौर किया जाए तो बीते पांच साल के भीतर सीएमओ रहे डॉक्टर हरिश्चंद्र श्रीवास्तव समेत 17 चिकित्सकों ने नौकरी छोड़ दी। इनमें से कुछ घर पर प्रैक्टिस कर रहे हैं तो कुछ लोग क्लीनिक और नर्सिंगहोम का संचालन शुरू कर दिया है।
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प्राइवेट अस्पतालों में काम कम, आमदनी ज्यादा
प्राइवेट में अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टरों पर सरकारी अस्पतालों के मुकाबले दबाव कम होता है। साथ ही उनकी आमदनी भी ज्यादा होती है। हमेशा कार्रवाई का डर भी नहीं रहता है। ओपीडी में मरीजों की संख्या भी मनमुताबिक होती है। वीआईपी ड्यूटी, पोस्टमार्टम और इमरजेंसी से भी डाक्टर बचे रहते हैं। यही कारण है कि उन्हें प्राइवेट अस्पताल ज्यादा पसंद आ रहे हैं।
किसी को नौकरी देना और छीन लेना मेरे हाथ में नहीं है। परीक्षा पास कर डॉक्टर बनकर आते हैं और मन होता है तो बगैर किसी सूचना के गायब हो जाते हैं। लंबे समय से गायब चिकित्सकों की रिपोर्ट शासन को भेज दी जाती है।
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डॉक्टर अरविंद कुमार श्रीवास्तव, सीएमओ।
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