शहर में जाम का सबसे बड़ा कारण चिलबिला रेलवे क्रासिंग पर बनने वाले आरओबी का निर्माण एक दशक बाद भी पूरा नहीं सका है। कार्यदायी संस्था को इसे 2016 में पूरा करना था, लेकिन अब 2017 में भी इसके चालू होने के आसार नहीं नजर आ रहे हैं। पुल की हालत और निर्माण कार्य की गति देखकर लोग कहने लगे हैं कि वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में फिर यह मुद्दा बनेगा।
गौरतलब है कि जिले में बीते तीन लोकसभा चुनाव में चिलबिला ओवरब्रिज सबसे बड़ा मुद्दा रहा, लेकिन एक दशक बाद भी इसका निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका। पुल को सितंबर 2016 से चालू करने का वादा जिम्मेदारों ने किया। साल बीत गया मगर निर्माण पूरा नहीं हो पाया। फिर फरवरी 2017 में इसको चालू करने की जुमलेबाजी शुरू हुई। फरवरी बीत गई पुल जस का तस रहा। जनप्रतिनिधि और इसकी देखरेख कर रही प्रशासनिक मशीनरी की उपेक्षा के चलते पुल का निर्माण अधर में लटका गया है। पुल कब तक पूरा होगा, इसके बारे में ठीक-ठीक बताने वाला कोई नहीं है। शहरियों का कहना है कि पुल की प्रगति को देखते हुए लग रहा है कि दो साल बाद होने वाला लोकचुनाव भी इसी चिलबिला ओवरब्रिज पर लड़ा जाएगा।
एक दशक से अधिक का समय बीत चुका है, मगर पुल चालू नहीं हो पाया है। हर बार थोड़ा-थोड़ा काम ही हो पाया। दो लोकसभा में आधारशिला से लेकर पिलर की खुदाई का काम हुुआ। तीसरी लोकसभा के चुनाव के बाद पुल का काम शुरू जरूर हुआ मगर इसमें वह तेजी नहीं आ पाई जो आनी चाहिए। बीच में इस पर राजनीति शुरू हो गई थी। कार्यदायी संस्था ने निर्माण में अड़ंगेबाजी के लिये प्रशासनिक मशीनरी को ही जिम्मेदार ठहराया है। वहीं अफसरों का कहना है कि पुल की लेटलतीफी के लिये काम करा रही फर्म के लोग इसके लिये जिम्मेदार हैं। जलनिगम की लापरवाही साफ दिखाई पड़ रही है।
इलाहाबाद-फैजाबाद हाईवे पर पडने वाले चिलबिला क्रांसिंग के कारण शहर में भीषण जाम लगता है। रेलवे क्रासिंग पर लगने वाले भीषण जाम में लोग घंटों फंसे रहते हैं। कई बार तो गंभीर रोगियों को ले जा रही एंबुलेस को इंतजार करना पड़ जाता है। गर्भवती महिलाओं को भी जाम का झाम झेलना पड़ रहा है। शादी-विवाह और गरमी के मौसम में तो जाम में फंसे लोगों की हालत खराब हो जाती है। लोगों के लिये यह जाम किसी कोढ़ से कम नहीं है। चिलबिला रेलवे क्रासिंग पर पुल बनाकर लोगों को इससे निजात दिलाने के लिये पिछले एक दशक से शहरियों कऊो झांसा दिया जा रहा है। बीते लोकसभा के दोनों चुनाव मेें यह मुद्दा प्रमुखता से छाया रहा, मगर पुल का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया। क्रांसिग बंद होने और खुलने के समय जाम की स्थिति बड़ी भयावह होती है। चिलबिला से लेकर चौक घंटाघर तक लंबा जाम लग जाता है। जिससे पूरे शहर का ट्रैफिक रेंगने लगता है।
वर्ष 2004 में लोकसभा का चुनाव जीतने के बाद तत्कालीन सांसद अक्षय प्रताप सिंह ने 31 अक्तूबर 2007 को चिलबिला ओवरब्रिज के निर्माण की आधारशिला रखी। जिससे पुल के निर्माण की आस लोगों में जगी। उसके बाद चुनाव जीतकर आई राजकुमारी रत्ना सिंह ने पांच साल में केवल पिलर का गड्ढ़ा ही खुदवा पाईं। जिससे काम आगे नहीं बढ़ पाया। वर्ष 2014 में चुनाव जीतकर आये कुंवर हरिवंश प्रताप सिंह के कार्यकाल में पुल का काम आगे बढ़ा। मगर तीन साल में वह प्रगति नहीं मिल पाई जो मिलनी की उम्मीद जताई गई थी। कुंवर हरिवंश ने नितिन गडकरी को यहां पर लाकर यह वादा किया था कि पुल 2016 में चालू कर दिया जायेगा, मगर पुल पूरा नहीं हो पाया साल भी बीत गया। वर्ष 2017 लग गया है।