पीलीभीत। टाइगर रिजर्व के प्राकृतिक स्रोतों की बहुलता और बेहतर जलवायु के कारण जनपद में बाघों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन जंगल का इलाका सिकुड़ने की वजह से बाघ वहां से निकलकर आबादी की ओर आ रहे हैं। 12 बाघ तो अमरिया इलाके के आबादी क्षेत्र में लंबे समय से रह रहे हैं। इसके चलते इनका स्वभाव भी बदल गया है। अब ये बाघ इंसानों पर हमलावर नहीं होते। मगर, आबादी इलाके में बाघों की सुरक्षा चिंता का विषय है। कुछ दिन पहले अमरिया क्षेत्र में तारों के फंदे में फंसे बाघ की घटना से इस कुनबे पर सुरक्षा का संकट है।
हर साल 29 जुलाई को विश्व बाघ दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें बाघों की संख्या बढ़ाने और उनकी सुरक्षा पर गोष्ठी वगैरह होती हैं। मगर ये सब कार्यक्रम तक ही सीमित रहता है। बाघों की संख्या बढ़ाने के अलावा उनकी सुरक्षा पर केवल हवा-हवाई बातें होती हैं। ठोस उपाय नहीं किए जाते। प्राकृतिक वन संपदा और बेहतर जलवायु से भरपूर 73 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फैले टाइगर रिजर्व के जंगलों में बंगाल टाइगर श्रेणी के बाघ पाए जाते हैं। पुरानी गणना के अनुसार टाइगर रिजर्व में 65 से अधिक बाघ होने की बात कही जा रही है। मगर, नई गणना में बाघों की संख्या इससे ज्यादा पहुंच सकती है। बाघों की संख्या बढ़ाने की खुशी तो टाइगर रिजर्व के अफसरों पर दिखती है, मगर उनकी सुरक्षा अभी भी चिंता का विषय है।
बेघर बाघों को कब मिलेगी जंगल की आवोहवा
टाइगर रिजर्व में बाघों की बढ़ती संख्या वन्यजीव के लिहाज बेहतर संकेत है, मगर इन सबके बीच दुखद पहलू यह है कि बंगाल टाइगरों का एक बड़ा कुनबा, जिसमें 10 से 12 बाघ शामिल हैं, एक दशक से बेघर है। जंगल के सिकुड़ते दायरे के चलते बाघों का यह कुनबा नदी के किनारे और जंगल के खेतों में दर बदर भटकता रहता है। इन बाघों को वासस्थल तक पहुंचाने के नाम पर हर साल लाखों रुपये खर्च कर अभियान भी चलाए गए, मगर, वह केवल फाइलों में सिमट गए। बाघों को घर नहीं मिल पाया।
फंदे में फंसा बाघ तो एनटीसीए को आई याद
वन विभाग के अफसरों के मुताबिक, अमरिया क्षेत्र में जंगल से बाहर प्रवास कर रहे बाघों की सुरक्षा को लेकर उनकी पर्याप्त व्यवस्था है, मगर कुछ दिन पूर्व शिकारियों द्वारा लगाए गए तार के फंदे में एक बाघ के फंसने की घटना ने बाघों की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। एनटीसीए के डीआईजी निशांत वर्मा ने भी घटना को संज्ञान में लिया। उन्होंने अमरिया क्षेत्र का दौरा कर अधिकारियों को बाघों की सुरक्षा पुख्ता करने के निर्देश भी दिए। मगर, उन पर अभी ठोस प्रयास शुरू नहीं हुए। अमरिया में आबादी के बीच रहने वाला बाघों का यह कुनबा इंसानों पर हमलावर नहीं होता, मगर क्षेत्रवासियों को बाघों का खुले में इस तरह रहना भी रास नहीं आता। इंसान इन बाघों से भी उतना ही डरते हैं, जितना की जंगली बाघों से।
टाइगर शिफ्टिंग योजना भी अधर में
अमरिया के खुले क्षेत्र में घूम रहे बाघों की शिफ्टिंग को लेकर साल की शुरूआत में ही प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव सुनील कुमार पांडे ने कवायद शुुरू की थी। उन्होंने डब्ल्यूआईआई (वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) से बाघों की शिफ्टिंग की अनुमति के लिए पत्र भेजा था, मगर उसके बाद से यह योजना अधर में है। हालांकि टाइगर रिजर्व के अफसरों का कहना है कि बाघों की शिफ्टिंग को लेकर उच्चाधिकारियों में मंथन चल रहा है। मगर, यह्य बाघ कहां और कब तक शिफ्ट किए जाएंगे, इसका अभी तक खुलासा नहीं हो पाया है।
अमरिया क्षेत्र के बाघों की सुरक्षा को लेकर लगातार टीमें लगी हुई हैं। एनटीसीए के उप वन महानिरीक्षक ने यहां आकर जायजा लिया था। उनसे भी अनुरोध किया गया है कि जो शावक अब ढाई साल के हो चुके हैं, उन्हें कहीं अन्यत्र शिफ्ट किया जाए। उच्च स्तर पर इस मामले में अध्ययन किया जा रहा है। - संजीव कुमार, डीएफओ, सामाजिक वानिकी