देवहा नदी का निरीक्षण करती डब्ल्युडब्ल्युआई की टीम।
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पीलीभीत। जनपद में मगरमच्छ के संरक्षण को लेकर प्रयास शुरू किए गए हैं। इसके लिए बुधवार को देहरादून से वन्यजीव संस्थान की टीम ने शहर के जल प्रभावित क्षेत्र खकरा नदी का दौरा कर हकीकत को परखा। सर्वे के बिंदुओं को पूरा करने के बाद टीम उत्तराखंड के खटीमा में बने मगरमच्छ संरक्षण केंद्र को भी देखने पहुंची।
जनपद का भौगोलिक वातावरण वन्यजीवों के लिए मुफीद है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व का बेहतर ग्रास लैंड और पानी की पर्याप्त व्यवस्था होने से बाघ समेत अन्य वन्यजीवों की संख्या में भी इजाफा हो रहा है। इसके अलावा जलाशयों और नदियों का जाल होने के चलते जनपद में मगरमच्छ की संख्या भी बेहतर है। इसमें शारदा सागर डैम, माला नदी और खारजा नहर, खकरा नदी में मगरमच्छ की मौजूदगी बनी रहती है। बरसात के दौरान जलाशयों से निकलकर मगरमच्छ आबादी क्षेत्र में भी पहुंच जाते हैं, जो ग्रामीणों के लिए भी खतरा साबित होने लगते हैं। पूर्व में जनपद में मगरमच्छ हमले की कई घटनाएं भी सामने आ चुकी है। संरक्षण केंद्र न होने से रेस्क्यू करने के बाद मगरमच्छ को फिर से नदी, नहरों में छोड़ दिया जाता है।
इधर पिछले दिनों शहर के समाजसेवी अधिवक्ता शिवम कश्यप ने मगरमच्छ संरक्षण को लेकर आवाज उठाई। डीएम से मिलकर संरक्षण के बिंदुओं पर चर्चा की। डीएम ने भी मामले में सहमति जाहिर की। इसके बाद समाजसेवी के अनुरोध पर डीएम की अनुमति के बाद एक पत्र देहरादून स्थित वन्यजीव संस्थान को भेजा गया। बुधवार को देहरादून से वन्यजीव विशेषज्ञ विपुल मौर्या के नेतृत्व में दो सदस्यीय टीम सर्वे कार्य के लिए जनपद दौरे पर पहुंची।
टीम ने समाजसेवी के साथ शहर की खकरा नदी क्षेत्र का दौरा कर हकीकत को परखा। सर्वे के तमाम बिंदुओं को देखने के साथ जानकारी जुटाई। इसके बाद टीम खटीमा में बने मगरमच्छ संरक्षण केंद्र को देखने के लिए पहुंची। देहरादून से आए वन्यजीव विशेषज्ञ विपुल मौर्य ने बताया कि मगरमच्छ संरक्षण के लिए खकरा नदी क्षेत्र का दौरा किया गया। संरक्षण के लिए क्षेत्र की स्थिति भी बेहतर है। धूप आदि निकलने के बाद मगरमच्छ की ट्रेसिंग की जाएगी। इसके बाद ही कार्रवाई को आगे बढ़ाया जाएगा। टीम में सुमित नौटियाल भी शामिल थे।
मौसम के कारण मगरमच्छों की ट्रेसिंग नहीं हो पा रही है। नदी क्षेत्रों का का भ्रमण कर लिया गया है। धूप निकलने के बाद ट्रेसिंग शुरू कर दी जाएगी। खटीमा में मगरमच्छ संरक्षण केंद्र का भी निरीक्षण किया गया। विपुल मौर्य, वन्य जीव विशेषज्ञ, देहरादून