पीलीभीत। सावन में जब तराई की ठंडी हवा के साथ बरसती बूंदें मिट्टी को छूती थीं तो फिजा में एक सोंधी सी खुशबू घुल जाती थी। यह महक गांवों से लेकर शहर के मोहल्लों तक बेटियों और बहुओं के चेहरों पर आने वाली मुस्कान की दस्तक होती थी। लेकिन बदलते दौर के साथ अब सावन के महीने में ऐसा कुछ नहीं रहा। पेड़ों पर पड़ने वाले झूले गायब हो गए हैं।
आधुनिकता की दौड़ और सिमटते बाग-बगीचों के बीच सावन का वह पारंपरिक रंग फीका पड़ गया है। अब न तो नीम, आम और बरगद के पेड़ों पर मजबूत रस्सियों वाले झूले दिखते हैं और न ही पहले जैसी उमंग, लोकगीत और रस्में सावन के महीनों में देखने को मिलती हैं। शहर की महिलाओं का मानना है कि अब सावन में पहली जैसी बात नहीं रही। उनका कहना है कि उनके समय में वह सावन के माह में मायके जातीं थीं, लेकिन आज के घर के व्यस्तता में सब कुछ पीछे छूट गया है। अब सिर्फ बाजार जाना, पारंपरिक तीज पूजा व सोलह शृंगार करने तक ही सावन रह गया है, बच्चे भी अब मोबाइल में ही खुश रहते हैं।
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सावन के दिनों की बात ही कुछ और थी, घर और सामाजिक बदलती रीतियों में अब काफी कुछ नहीं हो पाता। हां लेकिन सावन के महीने में फिर भी सालभर से ज्यादा खुशी रहती है। - स्नेहलता आर्या
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सावन में पहले तो मायके जाना, सावन के झूले डालकर झूलना ये सब हो जाता था। लेकिन शादी के बाद अब पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझकर व बदलते दौर में चीजें खत्म होते देखने को ही सिर्फ मिल रहा है। - पूनम अरोरा
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सावन के वो भी दिन थे, जबकि हम छोटे बच्चे हुआ करते थे और अपनी सहेलियों के साथ सावन के माह का उत्सुकता से इंतजार किया करते थे। लेकिन अब दोस्तों से ही पूरे समय बात हो जाए तो वो ही बड़ी बात है। - शिखा रस्तोगी
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सावन में अब सिर्फ हरियाली तीज पर साज-सज्जा आदि को लेकर ही चीजें पूरी हो पाती हैं। काफी कुछ नहीं हो पाता। पहले के दिन की बात ही कुछ और है। - नमिता रस्तोगी
स्नेहलता आर्य।- फोटो : Archive
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