पीलीभीत। जंग के भयावह मंजर के बीच रात में नींद नहीं आती है। आंख लगती है तो बम के धमाके और इमारतों से निकलते आग के गोले दिखाई देते हैं। सब डरे हुए हैं। एक ही दुआ है कि सही सलामत अपने वतन लौट सकें। खारकीव से जंग के बीच से निकलकर पोलैंड बॉर्डर की तरफ जाने का सहारा मिला तो जान में जान आई। कई दिन एक वक्त का खाना खाकर गुजरे। अंशुल गुप्ता, करनजीत और अरविंद पाल ने फोन पर परिजनों से यही हालात बयां किए।
जिले के 23 लोग यूक्रेन में फंस गए थे। राहत की बात है कि इनमें 11 अपने वतन लौट चुके हैं। वहीं 12 यूक्रेन से निकलकर बॉर्डर एरिया या पड़ोसी देशों में पहुंच गए हैं। शहर की वसंधुरा कॉलोनी के रहने वाले अंशुल गुप्ता खारकीव में फंसे थे। उनको रविवार को यूक्रेन के ही शहर लवीव जाने के लिए बस मिली। यहां से पोलैंड बॉर्डर करीब 70 किलोमीटर दूर है। वहीं, कलीनगर के गांव सकरिया निवासी करनजीत सिंह और अरविंद पाल सिंह दो दिन से स्लोवाकिया बार्डर पर हैं। वह कहते हैं कि दस दिन तक जंग के बीच रहना उनके लिए बुरे सपने से कम नहीं। धमाकों की आवाज से दिल दहल उठता था। अब स्लोवाकिया के बॉर्डर पहुंचने पर उन्होंने राहत की सांस ली है।
दस दिन तक देखा भयानक मंजर, बॉर्डर पहुंचने पर मिली राहत: कलीनगर हसील क्षेत्र के गांव सकरिया निवासी करनजीत सिंह और अरविंद पाल सिंह सगे चचेरे भाई है। ढाई साल पहले लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्ट की पढ़ाई करने के लिए यूक्रेन के कीव गए थे। रूस और यूक्रेन के बीच छिड़ी जंग के बाद दोनों भाई भी वहां फंस गए। करनजीत के पिता हरदीप सिंह ने बताया कि शुरूआत में पुत्र से बात करना बहुत मुश्किल था। इससे परिजनों की धड़कनें बढ़ गई थीं, लेकिन फिर पुत्र ने उसके साथ कई अन्य लोगों के भी होने की बात कहकर दिलासा दिया।
बेटे ने बताया कि टॉयलेट जाना भी मुश्किल हो गया था। मोबाइल चार्ज करने के लिए भी अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा था। दो दिन हॉस्टल में रहने के बाद भारतीय दूतावास ने संपर्क कर उन्हें कुछ दूरी पर ले जाकर मेट्रो के बंकर में रखा। यहां खाना और पानी की दिक्कतें पेश आईं। धमाकों की आवाज लगातार कानों में गूंज रही थी। चार दिन पूर्व दोनों अन्य साथियों के साथ बॉर्डर के लिए 40 किलोमीटर पैदल चले। इसके बाद प्रति व्यक्ति 16 हजार रुपये के हिसाब से चार लोग गाड़ी में सवार होकर बॉर्डर के लिए निकले तो कुछ दूर पहुंचते ही यूक्रेन की फौज ने रोक लिया।
कागजात देखने के बाद रात का हवाला देकर खतरे की बात कहते हुए कैंप में ही ठहराया। सुबह होने पर फौज के जवानों ने दूसरे रास्ते से रवाना किया। बॉर्डर पार कर स्लोवाकिया पहुंचने पर सभी ने राहत की सांस ली। पिता के मुताबिक बेटे ने बताया कि स्लोवाकिया के लोगों ने बॉर्डर पर राहत कैंप लगा रखे हैं। जिसमें खाने-पीने के अलावा कपड़ों की भी व्यवस्था की गई है। पुत्र अब सुरक्षित स्थान पर है। उसने बताया कि उसके कुछ अन्य साथी अभी यूक्रेन में ही फंसे हैं। उनके आने के बाद ही स्वदेश लौटने की स्थिति साफ होगी। दो दिन से दोनों भाई स्लोवाकिया बार्डर पर ही मौजूद हैं। संवाद