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सरकार की बेरुखी से आहत हैं शहीद रमेश के गांव वाले

Tue, 25 Jul 2017 10:42 PM IST
जलालाबाद। 
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सरकार की बेरुखी से आहत हैं शहीद रमेश के गांव वाले - फोटो : सरकार की बेरुखी से आहत हैं शहीद रमेश के गांव वाले
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कारगिल विजय दिवस पर विशेष
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अशोक द्विवेदी 

कारगिल विजय की शौर्यगाथा को अपने रक्त से लिखने वाले रणबांकुरों में गांव काबिलपुर के रमेश चंद्र का नाम भी शामिल है। गांववालों के जेहन में आज भी रमेश चंद्र की यादें ताजा हैं। वे उनकी शहादत और जन्मदिवस पर घरवालों के साथ उनके स्मारक पर फूल चढ़ाना कभी नहीं भूलते लेकिन शासन-प्रशासन के स्तर से अब कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता। सरकार की बेरुखी से गांव वाले बेहद आहत हैं।
काबिलपुर गांव से शुरू हुआ रमेश चंद्र के जीवन का सफर कारगिल में मां भारती की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति से पूर्ण हुआ। रमेश चंद्र की शहादत को 18 साल का लंबा समय बीत चुका है लेकिन घर के लोगों को आज भी यह कल की ही तो बात लगती है जब उनके बहादुर बेटे की शहादत पर गांव का जर्रा-जर्रा रोया था। हर किसी ने उसकी शहादत को सलाम किया था तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया था।
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 गांव के प्रधान रहे चतुरी लाल और उनकी पत्नी सुशीला देवी के तीन पुत्रों में सबसे छोटे रमेश चंद्र 20, अक्तूबर 1971 को जन्मे थे। तिलहर से हाईस्कूल करने के बाद रमेश 1991 में सेना की जाट रेजीमेंट में भर्ती हो गए। इसके बाद 1999 में छिड़े कारगिल युद्ध के दौरान जब वह मोर्चे पर थे तो 12 जून की भोर में दुश्मन की एक गोली उनके सीने को भेदती हुई पार निकल गई।

बेटे का मुंह भी नहीं देख पाए थे रमेश 
रमेश की पत्नी सुनीता ही नही बल्कि घर और गांव के लोग आज भी उस क्षण को नहीं भूले हैं जब रमेश चंद्र की शहादत की खबर मिली। उन दिनों पूरा परिवार खूशी में डूबा था। शहादत से महज पांच दिन पहले यानी सात जून को रमेश की पत्नी सुनीता ने बेटे अशोक को जन्म दिया था। इस खुशी में शामिल होने के लिए रमेश को भी पत्र भेजा गया लेकिन होनी को यह मंजूर नही था। रमेश बेटे का मुंह भी नहीं देख पाए और दुनिया से विदा हो गए।

बेटा कर रहा फौज में जाने की तैयारी
शहीद रमेश चंद्र की इच्छा अपने बच्चों को उच्च शिक्षित करने की थी। पति की शहादत के बाद उनकी इस इच्छा को पूरा करने के लिए सुनीता बच्चों को लेकर बरेली रहने लगीं। बड़ी बेटी सोनी के वह हाथ पीले कर चुकी हैं। सरकार की ओर से मिले पेट्रोल पंप की देखभाल उनके भाई और देवर मिलकर करते हैं। रमेश चंद्र के पिता चतुरी लाल और सबसे बड़े भाई राजाराम की मौत हो चुकी है, जबकि बूढ़ी मां सुशीला और अन्य घरवाले गांव में ही रहते हैं। रमेश चंद्र का बड़ा बेटा सेना में भर्ती की तैयारी कर रहा है।

अब तक नहीं बदला जा सका गांव का नाम 
शहीद के गांव काबिलपुर में प्रशासन ने बिजली समेत अन्य सुविधाएं तो दुरुस्त करा दी हैं लेकिन जो टीस घरवालों को आज भी है, वह है गांव का नाम शहीद रमेश चंद्र नगर न घोषित किया जाना। भाई उमेश के अनुसार रमेश की शहादत पर गांव पहुंचे तत्कालीन डीएम समेत अन्य आला अधिकारियों ने गांव का नाम शहीद रमेश चंद्र नगर करने का वादा किया था। इसे कई बार याद दिलाने के बावजूद आज तक पूरा नहीं किया गया है।
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स्मारक भी घरवालों ने अपने खर्चे से बनवाया 
पति रमेश की शहादत के बाद उनकी यादें संजोए रखने के लिए सुनीता ने घरवालों के साथ मिलकर गांव में अपनी जमीन पर अपने खर्चे से स्मारक का निर्माण कराया था। इसमें रमेश की प्रतिमा लगी है। वहां पेड़-पौधे भी लगवाए गए हैं। 
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