कंचनजंगा के शिखर पर तिरंगा लहराते सत्यदीप गुप्ता।
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पीलीभीत। चेन्नई की एक मर्चेंट कंपनी में इंजीनियर की नौकरी करने वाले पुरनपुर निवासी सत्यदीप गुप्ता ने दुनिया की तीसरी और भारत की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा को फतेह किया है। शिखर की सफल चढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने भारतीय तिरंगा फहराकर खुशी का इजहार किया।
पूरनपुर के बमनपुरी मोहल्ले में रहने वाले 37 वर्षीय सत्यदीप को शुरू से ही पहाड़ों की ऊंची चोटियां चढ़ने का शौक था। 2013 में उन्होंने इसकी शुरूआत की। 2014 में उन्होंने लद्दाख के माउंट नन (ऊंचाई 7135 मीटर) की चढ़ाई की। हालांकि इसमें वह सफल नहीं हो सके। इससे पहले वह तंजानिया अफ्रीका की किलीमंजारो (ऊंचाई 5895 मीटर) की चढ़ाई में भी असफल हुए। 2016 में उत्तराखंड के शिखर डीकेडी-2 को फतेह करने में सफल हुए। इसकी ऊंचाई 5700 मीटर है। पिछले साल लद्दाख की चोटी यूटी कंगरी की चढ़ाई में कामयाब नहीं हो सके। इसकी ऊंचाई 6100 मीटर है।
सत्यदीप का सपना भारत की सबसे ऊंची चोटी कंचनजंगा को फतेह करने का था। इसी सपने को साकार करने के लिए वह 11 सदस्यों की टीम के साथ नेपाल पहुंचे। नेपाल के टेपलजंग से आगे बने बेस कैंप से उन्होंने छह मई को चढ़ाई शुरू की। नौ मई सुबह 9 बजकर 6 मिनट पर वह शिखर पर पहुंच गए। यहां उन्होंने तिरंगा फहराकर अपनी खुशी का इजहार किया। इस चोटी की ऊंचाई 8,586 मीटर है। बता दें कि यह चोटी दार्जिलिंग से 74 किमी उत्तर -पश्चिमोत्तर में स्थित है। यह सिक्किम व नेपाल की सीमा को छूने वाले भारतीय प्रदेश में हिमालय पर्वत श्रेणी का एक हिस्सा है।
11 में छह लोग चढ़ाई पूरी करने में हुए सफल
सत्यदीप गुप्ता बताते हैं कि उनकी टीम में 11 लोग थे। इसमें पांच भारतीय और छह विदेशी नागरिक शामिल थे जो ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, रोमानिया से आए थे। छह मई को उनका सफर शुरू हुआ। बह बताते हैं कि इस चोटी की चढ़ाई काफी मुश्किल है। बर्फीले पहाड़ व सीधी चढ़ाई है। ऊंचाई काफी ज्यादा होने से ऑक्सीजन की भी दिक्कत होती है। हालांकि वह अपने साथ ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर गए थे।
वह आगे बताते हैं कि आखिर में करीब साढ़े तीन सौ मीटर तक सिर्फ पत्थर हैं। वहां बर्फ नहीं है। उन पर चढ़ना काफी मुश्किल था। ऊपर तक पहुंचने के लिए तीन कैंप बनाए गए थे। आखिरी कैंप में वह आठ मई को दोपहर दो बजे पहुंचे। शाम साढ़े छह बजे चढ़ाई शुरू की। रात में लगातार चले। सुबह नौ बजकर छह मिनट पर वह आखिरी प्वाइंट पर पहुंचे। उसी दिन शाम को नीचे उतरना शुरू किया। दस मई को वह नीचे पहुंचे।