आरोपपत्र पर न्यायालय में सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से कई गवाह पेश किए। पुलिस प्रोफेसर पर लगे आरोपों को सिद्ध करने में नाकामयाब रही। न्यायालय ने दोनों ओर से प्रस्तुत तर्कों को सुनने व पत्रावली का अवलोकन करने के बाद प्रोफेसर को दोषमुक्त करार दिया।
राज तो बहुत खुले मगर सिद्ध नहीं हो सके
इस मामले के बाद छात्राओं के अभिभावक सकते में आ गए थे। जैसे-तैसे पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया लेकिन इसे अंजाम तक नहीं पहुंचा सकी। आरोपपत्र में लगाए अपने ही आरोपों को पुलिस अदालत में साबित नहीं कर सकी। छात्रा के आरोपों के बाद पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर जब जांच शुरू की तब एक के बाद एक कई राज सामने आते गए। पुलिस ने अपनी जांच में प्रोफेसर कामरान आलम खान को दोषी ठहराया।
छात्रा के अदालत में बयान कराए। अपने बयान में छात्रा ने दुष्कर्म की बात कही थी। उसके इस आरोप से महाविद्यालय में खलबली मच गई। पुलिस अगर ठीक से जांच पड़ताल करती तो आरोपों को अदालत में साबित कर सकती थी। अदालत में प्रोफेसर के वकील की दलीलें काम कर गईं। अदालत को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे प्रोफेसर दोषी साबित हों।