पीलीभीत। पितृ पक्ष प्रारंभ हो चुका है। धर्म शास्त्रों में मान्यता है कि पितृ पक्ष के समय हमारे स्वर्ग सिधार चुके पूूर्वज पृथ्वी लोक में आकर अपने परिजनों का भोग स्वीकार करते हैं। अपने प्रति श्रद्धाभाव देखकर पितरों की आत्मा तृप्त होती है, तब वह अपने परिवार को आशीर्वाद देती है। यह मान्यता कितनी सच है, यह तो ईश्वर ही जाने, लेकिन वृद्धा आश्रम में रह रहे बुजुर्ग अपने भरे-पूरे परिवार को देखने के लिए तरह रहे हैं।
जिन बेटे-बेटियों को इन बुजुर्गों ने पाल पोषकर बड़ा किया और लायक बना दिया। वही बेटे-बेटी, बहू और नाती पोते अपने मां-बाप और दादा-दादी को अपने घर के एक कोने में रहने के लिए थोड़ी जगह और दो वक्त की रोटी नहीं दे सके। जब वह शरीर से कमजोर हुए तो बेटे-बेटियों ने अपने घर रखने के बजाय इन्हें वृद्धा आश्रम आकर छोड़ गए। यहां रहने वाले यह बागवां अपने अकेलेपन का दर्द या तो चुप रहकर विष की तरह पी जाते हैं या फिर कविताएं लिखकर उसे बयां करते हैं। वृद्धा आश्रम में इन्हें खाने के लिए दो वक्त की रोटी और कपड़ा तो मिलता है। मगर, इस रोटी और कपड़ा में वह स्नेह और प्रेम नहीं होता, जो घर में रहने पर बहू-बेटे को दिन-रात देखने और नाती-पोतों को खिलाने से मिलता। शहर से सटे बरहा स्थित वृद्धाश्रम में 16 बुजुर्ग रहते हैं। उनके अपनों ने बरसों से इन्हें बेसहारा छोड़ रखा है। यह बागवां अपनी इच्छा से वृद्धा आश्रम में नहीं रहना चाहते। किसी न किसी मजबूरी के चलते जिंदगी के बचे दिन काटने को मजबूर हैं। जब इनसे अपने परिवार से दूर रहने के बारे में पूछो तो यह बागवां अपने दिल का दर्द तो बयां करते हैं, लेकिन इतने दुखी होने के बाद भी अपने बेटे-बेटी को दोष नहीं देते। अमर उजाला ने जब इन बुजुर्गों से उनके परिवार बारे में पूछना चाहा तो तमाम बुजुर्गों की तो कुछ बोलने से पहले ही आंखें ही छलक आईं। इनके घर-परिवार की माली हालत के बारे में पूछने पर बोले- घर की हालत इतनी भी खराब नहीं कि उन्हें एक कोने में ही खटिया भर की जगह और दो वक्त की रोटी न मिल पाए। मगर, अगले ही पल वह कहते हैं कि इसमें उनके बेटे-बहू या अन्य किसी का दोष नहीं है। ईश्वर ने जब अकेले ही रहना भाग्य में लिख दिया है तो वह किसी को दोष कैसे दे सकते हैं। एक बुजुर्ग ने तो कविता लिखकर अपने अकेलेपन का दर्द कागज के कैनवास पर उकेरा। मगर, मुंह से कुछ नहीं बोले।
दो बेटे-तीन बेटियां, बहुएं आईं तो घर छोड़ना पड़ा
बरहा वृद्धाश्रम में 70 साल के अशोक गुप्ता तीन साल से रहते हैं। इस उम्र में अकेलापन बहुत कचोटता है, मगर इसके लिए अब भी अपनी औलाद को दोष नहीं देते। बहुत कुुरेदने पर कहते हैं कि उनके दो बेटे और तीन बेटियां हैं। सबकी शादी हो चुकी है। जब तक शादी नहीं हुई थी, तब तक घर में सब ठीक था। मगर, जब बहुएं आ गई तो दिक्कतें बढ़ गई। बेटों में बंटवारा हो गया। किसी भी बेटे ने उन्हें नहीं रखा तो पिछले तीन साल से वृद्धा आश्रम में रहते हैं। इतनी बात कहते हुए इनकी आंखों से आंसू भी छलक आए। मगर, इससे ज्यादा वह अपने परिवार के बारे में कुछ नहीं बोले। फिर इन्होंने अपनी लिखी एक दर्द भरी कविता सुनाई- आदमी गाये न गाये, दर्द कैसे चुप रहेगा...।
दोष किसको दूं.....अपनों ने ही दूर कर दिया
वृद्धाश्रम में 72 साल की मुन्नी गुप्ता की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। यह 11 साल से वृद्धा आश्रम में रहती हैं। इनके दो बेटे हैं। उनमें एक की पत्नी टीचर है। एक बेटे की दुकान है। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक ठाक है। मगर, किसी भी बेटे के घर में न तो इनके रहने के लिए जगह है, न ही खाने के लिए दो वक्त की रोटी। बेटे-बहू की बात करते हुए इनकी आंखें भी डबडबा गईं। बोलीं- पति गोपीचंद अक्सर बीमार रहते थे। उन्हें दवाओं की जरूरत रहती थी। उनकी दवा पर होने वाले खर्च से बेटों के व्यवहार में परिवर्तन आ गया। घर में रात दिन की चिकचिक होने लगी। बहुएं भी बर्दाश्त नहीं कर पाईं। इसलिए वह पति के साथ 11 साल पहले वृद्धाश्रम में आकर रहने लगी। कुछ समय बाद पति की वृद्धाश्रम में ही मौत हो गई। उस समय परिवार वाले देखने आए थे। फिलहाल, वह अकेले ही आश्रम में रहकर बचा खुचा जीवन काट रही हैं। इनका कहना है कि हम किसे दोष दें, जब अपनों ने ही दूर कर दिया।