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बंदरबोज में 2300 की आबादी........ मुख्य मार्ग जर्जर, जनता हो रही परेशान

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कलीनगर। पूरनपुर विधानसभा क्षेत्र का पहला बूथ बंदरबोज में है। जनजाति, अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले करीब 2300 लोग रहते हैं। गरीबों के लिए सरकारी आवास तो मिले लेकिन एक मात्र मुख्य सड़क लंबे समय से जर्जर है। गांव वाले हिचकोले खाकर सफर करने को मजबूर हैं। लोग बार बार यह मुद्दा उठाते रहे हैं लेकिन अभी तक सड़क को नहीं बनाया गया।
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पूरनुपर विधानसभा से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार पहला बूथ होने के चलते ग्राम पंचायत बंदरबोज को जरूर याद रखते हैं। यह गांव पहले बूंदीभूड़ ग्राम पंचायत के अधीन था। अत्यंत गरीब श्रेणी के वाशिंदों के गांव के विकास पर नजर दौड़ाई जाए तो इंदिरा आवास ले लेकर अन्य आवासीय योजना का अधिकांश लोगों को लाभ मिल चुका है। बच्चों की शिक्षा के लिए दो प्राइमरी पाठशालाएं तो हैं, लेकिन जूनियर हाईस्कूल की मांग अभी अधूरी है। इसके साथ ही एक पंचायत भवन भी है। लेकिन मूलभूत समस्याओं में सड़क अहम हैं। तहसील मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बसे गांव के लोगों को आवागमन के लिए मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं। कई दशक पहले बनी जनपद और उत्तराखंड की सीमा को जोड़ने वाली एक मात्र सड़क भी जर्जर स्थिति में हैं। नया निर्माण होने से पहले ही वन विभाग रोड़ा बन गया। कार्य पर रोक लगा दी गई। वन क्षेत्र में नए निर्माण पर रोक होने की वजह से सड़क का निर्माण भी फंसा हुआ है।
ढाई वर्ष पूर्व गांव बिजली से हो सका रोशन
आजादी के बाद से गांव के लोग बिजली को लेकर तरस रहे थे। ग्रामीणों की मांग के बाद दो दशक पूर्व सरकार की ओर से विद्युतीकरण का कार्य प्रारंभ कराया गया था, लेकिन वन क्षेत्र होने की बात कहकर वनविभाग ने कार्य पूरा नहीं होने दिया था। इधर ढाई वर्ष पूर्व गांव में विद्युतीकरण का काम आगे बढ़ाया गया, हालांकि इस बार भी वन विभाग ने रोड़ा डालने का प्रयास तो किया, लेकिन कार्य पूरा करा दिया गया। गांव बिजली से रोशन हो गया।
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भूमिधरी के पट्टों पर दो विभागों की आपत्ति
कई दशक पूर्व ग्राम समाज की ओर से आधा एकड़ के 25 पट्टे, एक बीघ से तीन बीघा तक 28 पट्टे किए गए, लेकिन सिंचाई और वन विभाग जमीन को अपना बताकर आपत्ति करता आ रहा है। इसी के चलते कुछ विकास कार्यो पर भी रोड़ा पड़ा है। हालांकि गांव में केवल 15 ग्रामीणों को ही राजस्व पट्टेदार मानता आ रहा है।
..तो डैम के निर्माण में भी निभाया था योगदान
प्रथम पंच वर्षीय योजना के तहत बना शारदा सागर डैम क्षेत्र के बारे में भी गांव के परिवारों की यादें जुड़ी हुई हैं। गांव के थारू परिवार के माने तो पहले इनका परिवार डैम क्षेत्र में बसा था। जब डैम का निर्माण शुरू किया तो इनके परिवारों को डैम के बाहरी क्षेत्र जो अब बंदरभोज है, में बसा दिया था। इन परिवारों ने भी डैम के निर्माण में अपना पसीना बहाया था।
यह हैं गांव के वोटर
- अनुसूचित जाति - चार सौ मतदाता
थारू जनजाति - 350 मतदाता
पिछड़ी जाति - ढाई सौ मतदाता
(यह आकड़ें लगभग में हैं)
पहले यह इलाका काफी बीहड़ था। किस तरह से हम लोगों ने नेपाल सीमा से सटे इस गांव को आबाद किया और आज भी हम लोगों को मूलभूत सुविधाओं से भी वंचित रखा जा रहा है।
राम उग्र, पूर्व प्रधान
शारदा डैम बनाते समय हमारे पुरखों को वहां से हटाकर डैम के बाहरी हिस्से में बिठा दिया था। तब से हम लोग यहां रहते चले आ रहे हैं। वन विभाग कहता है जमीन हमारी है। अभी तक हम लोगों को मालिकाना हक ही नहीं मिले हैं। हर प्रसाद
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