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चारे पर खर्च को प्रति पशु मिल रहे 30 रुपये, उसमें भी बंदरबांट...तो कैसे सुधरें हालात

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पीलीभीत। अब तक सड़कों पर घूमने वाले गोवंशीय पशु तस्करों के हाथों या फिर हादसे में ही जान गंवा रहे थे। उन्हें सुरक्षित रखने के लिए गोशालाओं में भिजवाया गया। मगर, बेहाल सिस्टम के चलते वहां भी गायों की दुर्दशा ही होती है। गायों की देखभाल के लिए प्रति पशु रोजाना 30 रुपये मिलते हैं। एक तो यह बजट प्रतिदिन चारा, पानी के हिसाब से वैसे ही कम है, ऊपर से उसमें बंदरबांट होने से गोशालाओं में गायों की हालत बदतर हो गई है। भर पेट भोजन न मिलने और बीमारी से गायों के मरने के पीछे यह बड़ी वजह है।
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सूबे में भाजपा की सरकार है और केंद्र में भी, दोनों की प्राथमिकता गोवंश संरक्षण है। इसके चलते गोवंश को सुरक्षित रखने के लिए देवीपुरा, भरा पचपेड़ा समेत 19 गोशालाएं संचालित की जा रही हैं। इसमें दो हजार गोवंशीय पशु रखे गए हैं। इनके भरण पोषण के लिए तीन साल में अब तक दो करोड़ रुपये शासन से मिले। इसमें से 75 प्रतिशत बजट यानी डेढ़ करोड़ रुपये खर्च भी हो चुके हैँ, मगर गोशालाओं की तस्वीर बद से बदतर ही हुई है। प्रति पशु का प्रतिदिन का चारा खर्च शासन से 30 रुपये निर्धारित है। इसमें स्वस्थ पशु को पेट भरने के लिए रोजाना पांच से सात किलो भूसा और पांच किलो हरा चारा खिलाना चाहिए। रोजाना 12 से 15 किलो हरा चारा खिलाने के बजाय पशुओं को तीन से चार किलो भी प्रतिदिन नहीं मिलता। यह बात पशुपालन विभाग के अधिकारी भी स्वीकारते हैं।
बाजार में भूसे के दाम ज्यादा
बाजार में भूसा छह से पांच से छह रुपये किलो है जबकि हरा चारा ढाई से तीन रुपये किलो है। पशुओं का बजट इस हिसाब से कम है। मगर, इसे पूरा खर्च कर दिया जाए तो गोशाला के पशु इतने कमजोर नहीं रहेंगे, जितने इस समय हैं। अगर गोशाला संचालक ईमानदारी से अपना काम करें तो कुछ समाजसेवी भी गायों के चारे-पानी में मदद कर सकते हैं। मगर, गोशाला की देखभाल के नाम पर शासन से मिलने वाले बजट में खेल भी चलता है। इससे एक पशु को 30 रुपये का चारा और भूसा भी खाने को नहीं मिलता। कागजों में गोशाला चमकती रहती है। गायों का पेट भी कागजों में ही भरता रहता है। जब कभी हल्ला बढ़ता है और लापरवाही पकड़ में आती है तो जिम्मेदार एक दूसरे पर टालते हैं। शासन से मिलने वाली मदद को नाकाफी बताकर खुद का बचाव करने में लग जाते हैं। बड़े अफसर भी तब हरकत में आते हैं, जब कोई बड़ा मामला सामने आता है।
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कमजोर होकर मरती हैं गायें, चुपचाप दफना देते हैं
पूरा भोजन न मिलने से गोशालाओं में पलने वाली गायें कमजोर होकर मरती रहती हैं। गोशाला संचालक कई दिन पड़ा रखने के बाद पीछे खाली पड़ी जमीन में चुपचाप दफना देते हैं। उनका पोस्टमार्टम तक नहीं कराया जाता। जब कभी मामला खुलता है तो कुछ न कुछ बहाने बनाकर अपना बचाव करते हैं। कुछ माह पहले भर पचपेड़ा में शिफ्टिंग के नाम पर 134 गायें देवीपुरा गोशाला से निकाली गईं। वहां भी पहुंची नहीं। गोशालाओं में यह घपलेबाजी आए दिन होती है।
धरना प्रदर्शन भी हुए..मगर दबा दिए मामले
गोशाला में गायों के भरण पोषण को आई रकम के बंदरबांट को लेकर मामले पहले भी चर्चा में रहे हैं। कई बार गोशाला से पशुओं को तस्करों को बेचने की बातें उठीं। तीन साल पहले देवीपुरा गोशाला को लेकर ही धरना प्रदर्शन हुए थे। खातों की जांच कराने की भी मांग की गई। मगर जांच के नाम पर मामला ही दबा दिया गया। गोशाला की जिम्मेदारी संभालने वाले पूर्व के कई पदाधिकारी भी इन आरोपों में घिर चुके हैं। उन्हें वहां से हटा भी दिया गया। मगर, अब भी उनका गोशालाओं में दखल रहता है।
शासन से एक पशु पर प्रतिदिन 30 रुपये देखभाल के लिए मिलता है। यह रकम बहुत कम है। एक स्वस्थ पशु की डाइट इतने रुपये में नहीं आ सकती। पशुओं का पेट भरने के लिए अपने स्तर से भी खर्च किया जाता है। पशुओं को किसी तरह की तकलीफ नहीं होने दी जाती। बजट में बंदरबांट की बात गलत है। - डॉ. एके गर्ग, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी
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