तहसील क्षेत्र में चौपई टीमों का अधिक महत्व
गमजदा परिवारों में जाती हैं चौपई गाने वाले कलाकारों की टीमें
टीमों के लौटने पर ही परिवारों में चूल्हों पर चढ़ती हैं कढ़ाइयां
तहसील क्षेत्र में चौपई टीमों का काफी ज्यादा महत्व है। चौपई टीमें घरों पर जाकर गम दूर करती हैं। हर क्षेत्र में पर्व मनाने के अलग-अलग तरीके और रस्म रिवाज होते हैं। कहीं रंग, गुलाल तो कहीं भांग और शराब तक का सेवन करने से लोग नहीं हिचकते, लेकिन चौपई गाने वाले कलाकारों की टीमें दूसरों के गमों में शरीक होकर उन्हें शोकमुक्त करती है। वैसे तो चौपई परंपरा उचित सम्मान न मिलने के कारण काफी आहत हो चुकी है, लेकिन इस इलाके में गंावों के अलावा नगर में भी होली पर चौपई को महत्व दिया जाता है। चौपई गाने वाले कलाकारों की टीमें होली पर गमजदा परिवारों में जाती हैं और अपनी कलाओं का प्रदर्शन करती है। गमजदा परिवार के लोग टीमों को मिष्ठान बगैरा खिलाते हैं और उन्हें इनाम देकर सम्मानित करते हैं। इन चौपई टीमों के लौटने के बाद ही गमगीन परिवारों में चूल्हों पर कढ़ाइयां चढ़ती हैं। तब कहीं जाकर इन घरों में पूड़ी, पकवान और गुजियां आदि बनती हैं। गमजदा परिवार के लोग इन चौपई टीमों को अपने घरों का गम दूर करने के लिए बाकायदा निमंत्रण भेजते हैं। इन टीमों के कलाकार ग्रामीण अंदाज में नृत्य करते हैं। लोकगीत गाते हैं। ढोलक, चिमटा आदि वाद्य यंत्र बजाते हैं। ये चौपई टीमें लगभग सभी गांवों के अलावा नगर के मोहल्ला दुबे, दुर्गाप्रसाद, खेड़ा, ग्यासपुर और हबीबुल्ला खां में भी है। इन टीमों में कुछ बच्चे भी शामिल होते हैं। सभी टीमों में 15 से 20 कलाकार शामिल होते हैं। कलाकार नए कपड़े पहनकर अभिनय करते हैं। इन कलाकारों में प्रदर्शन के दौरान काफी उत्साह देखा जाता है। कलाकार पूरे वर्ष होली पर्व का बेसब्री से इंतजार करते हैं। प्रदर्शन के दौरान कलाकार मोर के पंखों से बनी मूंठों का भी बेहद आकर्षक ढंग से प्रदर्शन करते हैं। गुरुवार से इन चौपई टीमों का प्रदर्शन शुरू हो जाएगा और लगभग एक सप्ताह तक जारी रहेगा। कुछ गांवों में महिला कलाकारों की भी टीमें हैं, लेकिन नगर में महिला कलाकारों की कोई टीम नही है।