दिल्ली और बरेली के बाद धुंध की काली छाया से तराई का यह जिला भी अछूता नहीं रह गया है। शाम होते ही पूरा जिला धुंध के आगोश में सिमट रहा है। इससे हाईवे पर भी वाहनों की रफ्तार को ब्रेक लगने लगा है। डॉक्टरों के मुताबिक यदि यह धुंध जल्दी नहीं छंटी तो लोग खासी जुकाम के साथ आंखों और फेफड़ों की बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
तराई के इस जिले में साल दर साल मौसम लगातार करवट ले रहा है। पहले जहां ठंड अगस्त सितंबर में दस्तक दे देती थी, वह इस बार नवंबर माह के 10 दिन होने के बावजूद अपना असर नहीं दिखा सकी है। सर्दी के इस मौसम में भले ही ठंड ने देरी से दस्तक दी है, लेकिन कोहरे के समान दिखने वाली धुंध ने अपना कहर अभी से बरपाना शुरू कर दिया है। पिछले दो-तीन दिनों से शाम होतेे धुंध पूरे जिले को ही अपने आगोश में ले रही है। शहर में धुंध छाते ही सन्नाटा पसर जाता है। हाईवे पर चलने वाले वाहनों की रफ्तार भी ब्रेक होने लगती है। आलम यह है कि शाम होते ही धुंध छाने के बाद दृश्यता कम होने पर ट्रक व अन्य बड़े वाहन चालक अपने वाहनों को हाईवे के किनारे ढाबों पर खड़ा कर सुबह होने का इंतजार करते देखे जा सकते हैं। यह धुंध दोपहर तक छंट पाती है और शाम होते ही फिर से छाने लगती है। इससे न सिर्फ वाहनों की बल्कि जनजीवन की रफ्तार भी थमने लगी है।
कोहरा, धूल व वायु प्रदूषण का मिश्रण है धुंध-
जिला विज्ञान क्लब के जिला समन्वयक रहे लक्ष्मीकांत शर्मा बताते हैं कि धुंध एक तरह से कोहरा, धूल और वायु प्रदूषण का हानिकारक मिश्रण है, जो सूर्य के प्रकाश के साथ गठबंधन करता है। उन्होंने बताया कि कुहासा या धुंध भी एक तरह का कोहरा होता है। यदि दृश्यता की सीमा एक किलोमीटर या इससे कम है तो उसे धुंध या कुहासा कहा जाता है। इसी मिश्रण के छोटे खतरनाक कण फेफड़ों में प्रवेश करके हानि पहुंचाते हैं। उन्होंने बताया कि जिले में पर्यावरण के साथ लगातार हो रहे खिलवाड़ से ही यह परिस्थितियां पैदा हुई हैं। यदि पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब दिल्ली की तरह यहां की हवा भी जहरीली हो जाएगी।