हाथी से माल और सवारी की ढुलाई कराने की बात आपने खूब सुनी होगी, लेकिन एक ऐसा सरकारी विभाग भी है, जिसने हाथी से हल खिंचवा लेने का कारनामा कर दिखाया है।
ये है वन विभाग। 60 के दशक में तराई के जंगल में हाथी को हल लगाकर जंगल में प्लांटेशन (बीज बुआन) के लिए जुताई कराई जाती थी।
हाथी को लगाए जाने वाला विशेष तरह का दुर्लभ हल आज भी फारेस्ट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में सुरक्षित है।
गजराज जंगलात के लिए लकड़ी ढुलान, जंगल में गश्त आदि कामों में आते थे। हाथियों के लिए लालकुआं और रामनगर में हाथी खाना भी बनाए गए थे, जहां हाथी रखे जाते थे। महावतों की भर्ती होती थी।
तराई पूर्वी वन प्रभाग डीएफओ प्रसन्न पात्रों कहते हैं कि 1960 से पेशेवर और वृहद स्तर पर प्लांटेशन का काम जंगल में शुरू किया गया था।
इसमें बीज बुआन विधि अपनाई गई। चूंकि वृहद स्तर पर भूमि की जुताई होनी थी, इसके बाद बीजों का छिड़काव होता।
ऐसे में जंगलात का ध्यान हाथियों पर गया। महकमे ने हाथियों से जंगल में जुताई करने के बाद प्लांटेशन का काम लंबे समय तक किया।
पूर्व वन क्षेत्राधिकारी बीडी खुल्बे बताते हैं कि हाथी के हिसाब से खास गेयर वाले हल बनाए गए थे। जमीन में कितनी गहराई तक खुदाई की जानी थी, वह गेयर से नियंत्रित होता था।
महावत हाथी को चलता था, जबकि उसके साथ-साथ वन विभाग की टीम भी चलती थी। बाद में हाथी से जुताई का काम बंद कर दिया गया।
हाथी घास थी चुनौती
पूर्व प्रमुख वन संरक्षक आईडी पांडे कहते हैं कि भाबर के इलाके में बड़ी घास होती थी जिसे चौड़ कहा जाता था। घास की ऊंचाई के चलते इसे हाथी घास भी कहा जाता था।
इन घास के कारण पौधे पनप नहीं पाते थे, ऐसे में घास को हटाकर प्लांटेशन का काम साठ के दशक में शुरू किया गया है। इसके अलावा एग्रो फॉरेस्ट्री को भी अपनाया गया।