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उत्तर प्रदेश में होगी नरेंद्र मोदी की असली परीक्षा

Mon, 10 Jun 2013 12:57 AM IST
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
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भाजपा चुनाव समिति के अध्यक्ष बनाए गए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भले ही गुजरात में जीत का रिकार्ड बना डाला हो लेकिन उनकी असली परीक्षा उत्तर प्रदेश में होगी।
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न सिर्फ यूपी से पार्टी की लोकसभा में 10 सीटों की संख्या में बढ़ोतरी की चुनौती से निपटना होगा बल्कि भाजपा को फर्श से अर्श पर पहुंचाने वाली इस जमीन को फिर से कमल खिलाने के लिए उपजाऊ बनाने की तरकीब सोचनी होगी।

यूपी में अलग-अलग खेमों में बंटी भाजपा को एकजुट करना होगा तो हताश-निराश कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरनी होगी।

मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीतिक चुनौती से निपटना होगा तो अगड़ों व पिछड़ों को लामबंद करके कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा को घेरना होगा।

यह संदेश भी देना पड़ेगा कि पार्टी के प्राणतत्व अयोध्या, मथुरा व काशी जैसे स्थलों वाली इस भूमि पर भाजपा के कमल की जड़े सूख भले गई हों लेकिन सड़ी नहीं हैं।
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वैसे तो मोदी पर केंद्रीय चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के नाते पूरे देश में ही भाजपा का ग्राफ बढ़ाने की चुनौती है। पर परिस्थितियों को देखते इस फैसले के पीछे यूपी की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है।

उत्तर प्रदेश की कमजोरी ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर काफी कमजोर किया है। वर्ष 2004 में पार्टी को यूपी की 80 सीटों में सिर्फ 10 सीटें ही मिल पाई। नतीजा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के पतन के रूप में सामने आया। तभी से केंद्र में भाजपा सत्ता से बाहर है।

बीते नौ वर्षों में यूपी से लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए कई प्रयोग हुए। नेतृत्व में बदलाव किए गए। अयोध्या मुद्दे को वापस पार्टी के एजेंडे में लाया गया। पर सीटों की संख्या नहीं बढ़ी।

अमित शाह से आगाज
पिछले दिनों जब पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और मोदी के नजदीकी अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाने का फैसला हुआ तभी यह संकेत मिल गए थे कि संघ परिवार के रणनीतिकारों ने सफलता का पर्याय बन चुके मोदी के खाते में ही यूपी को डालने का फैसला भी कर लिया है।

मोदी को चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपकर एक तरह से इसकी औपचारिक शुरुआत भी कर दी गई। प्रभारी के रूप में अमित शाह और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में मोदी की जोड़ी को ही अब यूपी से सीटें बढ़ाने की लड़ाई लड़नी है।

पार्टी नेताओं को करना होगा एकजुट
नरेन्द्र मोदी हों या अमित शाह, दोनों को न सिर्फ बाहरी चुनौतियों से निपटना होगा बल्कि पार्टी के भीतर की चुनौतियों से भी पार पाना होगा।

खेमों में बंटे नेताओं को एकजुट करना होगा तो कार्यकर्ताओं में यह भरोसा भरना होगा कि उनके काम का मोल समझा जाएगा। यह काम बहुत आसान नहीं लगता, क्योंकि अभी तक कोई उपाय यूपी में भाजपा नेताओं की खेमेबाजी खत्म नहीं कर पाया है।

मुकाबला मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण से निपटने की
अब तय हो गया है कि उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में लगभग 20 से 22 प्रतिशत के बीच मानी जाने वाली मुस्लिम आबादी यूपी में चुप नहीं बैठेगी। मोदी के विरोध में इनका ध्रुवीकरण हो सकता है।

मुस्लिम समुदाय के नेताओं और सपा, कांग्रेस जैसे राजनीतिक दलों की भी कोशिश किसी न किसी रूप में मोदी को रोकने की होगी। इसके लिए ये भी मुस्लिमों के ध्रुवीकरण की कोशिश को हवा देंगे। मुस्लिम मतों को ध्रुवीकरण की काट का उपाय भी मोदी को तलाशना होगा।

जातीय समीकरणों की चुनौती
जब भाजपा को केंद्र में सत्ता मिली थी तब यूपी की सियासत में जातीय धड़े इस तरह बंटे हुए नहीं थे और न उनके अपने-अपने राजनीतिक खेमे थे।

भाजपा के पास कल्याण सिंह के रूप में सिर्फ हिंदुत्ववादी ही नहीं बल्कि पिछड़ों के बीच भरोसेमंद चेहरा भी था। तब पिछड़ों में वोटों को बंटवारा यादवों और गैर यादवों के बीच था। गैर यादव पिछड़ी जातियों कुर्मी, लोध, मौर्य, कश्यप, तेली, मल्लाह, साहू जैसी जातियां भाजपा के साथ खड़ी थीं।

दलितों में भी यही हाल था। जाटव व कुरील को छोड़कर सोनकर, खटिक, वाल्मीकि जैसी अति दलित जातियां भाजपा के समर्थन में रहती थीं। पर, आज स्थिति बदल गई है।

समाजवादी पार्टी न सिर्फ पिछड़ों बल्कि कुर्मी, प्रजापति, विश्वकर्मा, साहू, बुर्झी जैसी अति पिछड़ी जातियों के वोटों के बीच भी सेंध लगा ली है। अगड़े वोटों में ब्राह्मण, ठाकुर व वैश्य वोट उस तरह भाजपा के साथ एकजुट नहीं रहा है, जैसा पहले रहता था।

यही नहीं, ब्राह्मण व ठाकुरों के बीच ही नहीं बल्कि वैश्यों के बीच भी कई संगठन बन चुके हैं। जिनकी अपनी-अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं हैं। हिंदुत्व का एजेंडा आज उतना धारदार नहीं रहा है जिसके सहारे जातियों की गोलबंदी को तोड़ा जा सके।

ऐसी स्थिति में भाजपा रणनीतिकारों ने मोदी के रूप में हिंदुत्व, विकास और पिछड़े चेहरे के समीकरणों को एक साथ साधने की जुगत भले ही सोंची हो लेकिन अगड़ों, गैर यादव पिछड़ों व अति पिछड़ों व गैर जाटव व कुरील वोटों को भाजपा के साथ खड़ा करना बहुत आसान नहीं लग रहा है।
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