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घर जाने के लिए श्रमिकों ने किया हंगामा

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अपने गृह जनपद को लौटने के लिए रोडवेज पर हंगामा करते मध्य प्रदेश प्रवासी मजदूर। - फोटो : MUZAFFARNAGAR
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घर जाने के लिए श्रमिकों ने किया हंगामा
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मुजफ्फरनगर। लॉकडाउन के 52 दिन बीतने के बावजूद जिला प्रशासन प्रवासी श्रमिकों को उनके घर भेजने की समुचित इंतजाम करने में विफल है। आए दिन के आश्वासन से आक्रोशित टीकमगढ़ के श्रमिकों ने रोडवेज बस स्टैंड पर जबरदस्त हंगामा किया। ये लोग रेलवे स्टेशन के पास स्थित गोदाम के पास झोपड़ी डालकर रुके हुए हैं। लॉकडाउन के पहले दिन से ही घर भेजने की मांग कर रहे हैं।
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ के मजदूर ठेकेदार की ओर से रेलवे स्टेशन निर्माण के कार्य में लगे हुए थे। इनमें पुरुषों के अलावा महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। इन्होंने प्रशासन से घर भिजवाने की मांग की थी। 29 अप्रैल को मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद प्रशासन प्रवासी श्रमिकों को उनके घर नहीं भेज पाया। शनिवार को कई महिला एवं पुरुष श्रमिक रोडवेज बस स्टैंड पहुंच गए। उन्होंने वहां पुलिस के सामने हंगामा किया। श्यामलाल, बृजबिहारी, बुल्ली, सीताबाई, पप्पू आदि ने बताया कि उनके पास खाने को कुछ नहीं बचा है। प्रशासन उन्हें घर भिजवाने का केवल आश्वासन दे रहा है। उनकी किसी को फिक्र नहीं है। पुलिस ने उन्हें शीघ्र ही घर भेजने की व्यवस्था करने का आश्वासन देकर लौटा दिया।
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भूखे पेट रहे श्रमिक, नहीं मिला खाना
मुजफ्फरनगर। बुढ़ाना डीएवी डिग्री कॉलेज में भेजे गए बिहार के श्रमिकों को दोपहर तक खाना नहीं मिला। भूखे श्रमिकों ने प्रशासन से उन्हें घर पहुंचाने की गुहार लगाई है। बिहार के समस्तीपुर, वैशाली, बेगूसराय निवासी 14 श्रमिक शुक्रवार को करीब डेढ़ सौ किलोमीटर पैदल चल कर यहां पहुंचे थे। वो करनाल की एक फैक्टरी में काम करते हैं। प्रशासन ने उन्हें बिहार भेजने का आश्वासन देकर बुढ़ाना के डीएवी डिग्री कॉलेज में बनाए आश्रय स्थल पर भेज दिया। फोन पर बिहारीराम ने बताया कि प्रशासन ने उसे समेत राकेश, लालू, रामनरेश, भोला, अमित कुमार, हरदेव कुमार आदि को शुक्रवार रात को बुढ़ाना कॉलेज में भेज दिया था। शनिवार दोपहर बारह बजे तक उन्हें खाना भी नहीं मिला था। उन्हें चाय और बिस्केट देकर शांत रहने को कहा। श्रमिकों ने बताया कि गत दिवस से खाना नहीं मिलने के कारण उनकी हालत बिगड़ गई है। उन्होंने प्रशासन से बिहार भेजने की गुहार लगाई है। बिहारीराम ने फोन पर बताया कि यहां भूखे मरने से बेहतर है कि प्रशासन उन्हें यहां से हमें निकाल दे, जैसे हम करनाल से आए, वैसे ही पैदल या अन्य साधनों से अपने प्रांत पहुंच जाएंगे।
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