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वो जब भी होंठों पे मुस्कान लेके आता है हमारे क़त्ल का सामान लेके आता है

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वो जब भी होंठों पे मुस्कान लेके आता है हमारे क़त्ल का सामान लेके आता है
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मुजफ्फरनगर। उर्दू डेवलपमेंट आर्गनाइजेशन के तत्वावधान में उर्दू शायर पंडित आनंद मोहन जुत्शी उर्फ गुलजार देहलवी के निधन पर श्रद्धांजलि सभा और काव्य गोष्ठी हुई। अध्यक्षता डा. शमीमुल हसन ने की और मुख्य अतिथि कलीम त्यागी रहे।
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सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए शायरों ने गुलजार देहलवी को श्रद्धांजलि दी। कलीम त्यागी ने कहा कि गुलजार देहलवी ने कई दशकों तक उर्दू शायरी के माध्यम से उर्दू का विकास किया। डा. शमीमुल हसन ने कहा कि गुलजार देहलवी के निधन से उर्दू अदब का बड़ा नुकसान हुआ है। संचालन अल्ताफ़ मशल ने किया। गोष्ठी में अरशद जिया ने पढ़ा, निगल गई है उसे भी जमीन की पस्तीवो शख्श जो कभी शोहरत का आसमान रहा। अहमद मुजफ्फरनगर ने पढ़ा- वो जब भी होंठों पे मुस्कान लेके आता है, हमारे क़त्ल का सामान लेके आता है। तनवीर गोहर ने पेश किया- जिंदगी बेवफाई करती हैऔर इल्जाम अजल पे धरती है। शाहिद अरमान ने पढ़ा- अम्न का परचम उठा लें मुल्क दोनों ही अगर, एक दिन सरहद का मौसम खुशनुमा हो जाएगा। अल्ताफ मशल ने पढ़ा-दलाली करके यूं तो मैं कमा लेता बहुत दौलत मगर, इसकी इजाजत ही नहीं देती अना मुझको। तहसीन कमर ने पेश किया- यूं तो बजाहिर हम अपने घर में रहेमगर उम्र गुजरी है क़ैदखाने में। शहजाद सई ने पढ़ा- वक़्त ने जब भी आजमाया है ग़ैर ही मेरे काम आया है। अदीलुर्रहमान ने पेश किया- मिलती हैं जिनसे मंजिलें ये वो डगर कहां, रास्ते बनाऊं खुद ही मुझमें वो हुनर कहां। श्रद्धांलजि सभा में रईसुद्दीन राना, शुऐब, शहजाद, औसाफ़ अहमद, रजा खान, शमीम कस्सार, डॉ सलीम सलमानी, हुसैन त्यागी, बदर खान, कारी सलीम, मौलाना मूसा क़ासमी आदि मौजूद रहे।
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