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शुकतीर्थ से फैली श्रीकृष्ण की आध्यात्मिक अमरता

Tue, 04 Sep 2018 12:43 AM IST
अमर उजाला/ब्यूरो, मुजफ्फरनगर
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शुक्रताल में मौजूद श्रीकृष्ण की प्रतिमा। - फोटो : अमर उजाला
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श्रीमद्भागवत की उद्गम स्थली शुकतीर्थ स्थित शुकदेव मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। स्कंद पुराण काशी खंड आदि में शुक्रताल भारत के 68 तीर्थो में मोक्षदायक तीर्थ माना गया है। करुणा, ज्ञान, भक्ति और प्रेम के साक्षात प्रति स्वरूप श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन की जैसी अलौकिक मथुरा और वृंदावन से धरा पर फैली है, वैसी ही आध्यात्मिक अमरता शुकतीर्थ से जुड़ी है।
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भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व में श्रीमद्भागवत कथा का उपदेशामृत ग्रहण कर श्रद्धालु भागवत पुण्य की प्राप्ति कर रहे हैं। भागवत जन्म भूमि शुकदेव आश्रम में स्थित शुकदेव मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य प्रतिमा की आराधना की जाती है। व्यास नंदन महर्षि शुकदेव मुनि और हस्तिनापुर नरेश राजा परीक्षित, श्रीकृष्ण के चरणों में विराजमान है। मंदिर में महामुनि वेद व्यास, गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र, श्रृंगी ऋषि और समिक ऋषि की प्रतिमाएं है।

अक्षय वट वृक्ष के पावन टीले पर स्थित मंदिर का निर्माण वीतराग स्वामी कल्याणदेव महाराज ने कराया था। यह विश्व का एकमात्र मंदिर है, जिसमें श्रीकृष्ण के साथ राधा रानी नहीं है। शुकदेव मंदिर के पुजारी एवं कथा व्यास पंडित सुमन शास्त्री बताते हैं कि शुकतीर्थ में राधा रानी का गुप्त निवास है। जब 88 हजार ऋषि-मुनियों के साथ राजा परीक्षित ने श्राप मुक्ति को श्रीमद्भागवत कथा सुनी, तब भी महर्षि शुकदेव मुनि ने अपने श्रीमुख से कही गई भागवत में कहीं पर भी राधा का संबोधन नहीं किया।
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सिर्फ श्री कह कर अपने वृतांत को पूर्ण किया। भागवत के प्रथम खंड में स्पष्ट है कि नंद नंदन श्रीकृष्ण अपने भक्त राजा परीक्षित को श्राप से मुक्त कराने को स्वयं ही व्यास नंदन श्री शुकदेव जी बन कर शुकतीर्थ में अवतार लेते हैं। महाभारत में अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में शिशु परीक्षित को मारने के उद्देश्य से अश्वत्तथामा ने ब्रहमास्त्र छोड़ दिया था, तब श्रीकृष्ण ने उसका निवारण ब्रहमास्त्र से किया।

राजा परीक्षित को श्राप रूपी बागब्रज का प्रहार किया गया, तो स्वयं ही भगवान श्रीकृष्ण,  शुकदेव मुनि बन कर शुकतीर्थ में प्रकट हुए तथा बागब्रज का निवारण वाणी रूपी शास्त्र अर्थात श्रीमद्भागवत महापुराण से किया।  पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद सरस्वती कहते हैं कि ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की त्रिवेणी शुकतीर्थ में सर्व व्यापी भगवान श्रीकृष्ण की महिमा ज्योतिर्मय है। भागवत के कथा अमृत से मानव मात्र को जीवन कल्याण की प्राप्ति होगी है।
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