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महज आठ साल की उम्र में संभाली थी खाप चौधराहट

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कार्यक्रम में भोजन ग्रहण करते चौधरी महेन्द्र सिहं टिकैत। फाइल फोटो - फोटो : MUZAFFARNAGAR
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महज आठ साल की उम्र में संभाली थी खाप चौधराहट
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मुजफ्फरनगर/भौराकलां। महज आठ साल की उम्र में बालियान खाप की चौधराहट संभालने वाले किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। वर्ष 1987 में किसान-मजदूरों की आवाज बनकर सरकारी मशीनरी से लड़कर उन्हें उनका हक दिलाने वाले चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत आज भी सबके दिलों में बसे हैं।
किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म कस्बा सिसौली के किसान परिवार में छह अक्तूबर 1935 को हुआ था। पिता चौहल सिंह छोटी जोत के किसान व बालियान खाप के मुखिया थे। महज आठ साल की उम्र में पिता की मौत के बाद महेंद्र सिंह टिकैत को खाप की चौधराहट संभालनी पड़ी। बेहद कम उम्र में मिली जिम्मेदारी को बखूबी संभालने वाले चौधरी टिकैत कुछ समय बाद सर्वखाप के मंत्री चौधरी कबूल सिंह के साथ विभिन्न पंचायतों में जाने लगे, जहां उन्हें किसान-मजदूरों की दुर्दशा देख ग्लानि महसूस होने लगी। सरकारी महकमों द्वारा किसानों का उत्पीड़न देख उम्र के 52वें पड़ाव पर उन्होंने वर्ष 1987 में भारतीय किसान यूनियन का गठन किया।
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बढ़ती बिजली दरों के विरोध में भाकियू के बैनरतले शामली के करमूखेड़ी बिजलीघर पर मार्च 1987 में पहला आंदोलन किया गया। तत्कालीन प्रदेश सरकार ने पश्चिमी यूपी के इस पहले किसान आंदोलन को ताकत के बल पर दबाने का प्रयास किया। पुलिस लाठीचार्ज में दो किसान जयपाल व अकबर शहीद हो गए, जिसके बाद सरकार को किसानों के आगे झुकना पड़ा। इसके बाद किसानों की विभिन्न मांगों को लेकर मेरठ कमिश्नरी पर करीब डेढ़ माह तक दिए गए धरने ने चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत और भाकियू को देशभर में पहचान दी। वर्ष 1990 में दिल्ली के वोट क्लब पर दिए गए धरने और मुजफ्फरनगर के नइमा कांड ने तो सरकार को हिलाकर रख दिया। इसके बाद तो चौधरी टिकैत पूरे देश के किसानों की आवाज बन गए। उनकी एक आवाज पर देशभर के किसान धर्म-जाति से ऊपर उठकर एकजुट हो जाते थे। जहां वे धरना शुरू करते, वहां किसानों के साथ ही आम आदमी भी उनके साथ जुड़ जाता।
धरने पर रणसिंघों की बुलंद आवाज, हुक्के की गुड़गुड़ाहट के साथ ऊंच-नीच के भेदभाव को दूर कर साधारण तरीके से सबके साथ भोजन करने की आदत ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। एक समय वह भी आया, जब किसानों की आवाज बन चुके चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत से मिलने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के साथ ही प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और उप प्रधानमंत्री देवीलाल तक सिसौली में पहुंचे थे। इसके बावजूद चौधरी टिकैत ने किसान हितों के चलते हमेशा सत्ता से दूरी बनाए रखी। लंबे समय तक किसानों की आवाज बने रहे चौधरी टिकैत 15 मई 2011 को लंबी बीमारी के बाद किसान-मजदूरों को छोड़कर हमेशा के लिए चले गए। वर्तमान में उनके बड़े पुत्र चौधरी नरेश टिकैत बालियान खाप के मुखिया व भाकियू अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
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सबको भाता था ठेठ देहाती अंदाज
भौराकलां। किसान मसीहा चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का ठेठ देहाती अंदाज सबको भाता था। आम बोलचाल की भाषा शैली में देशी कहावतें व रामायण, महाभारत जैसे धार्मिक ग्रंथों के उदाहरण शामिल कर भाषण देने का उनका अंदाज बेजोड़ था। देशभर में ख्याति पाने के बावजूद सुबह बैलों को चारा डालना, खेत में हल चलाना, फसलों की निराई-गुड़ाई करना उनका शगल बना रहा। धरना- प्रदर्शन के दौरान किसानों के बीच बैठकर भोजन करने की सादगी ने भी उन्हें आम आदमी के साथ जोड़ा। देश-विदेश में भी कंधे पर चादर, पैरों में सादी चप्पल और सिर पर टोपी ने उन्हें अलग पहचान दी।
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