बस वही शाख बचेगी जो लचक जाएगी
मुजफ्फरनगर। आंधी मगरूर दरख्तों को पटक जाएगी, बस वही शाख बचेगी जो लचक जाएगी। आसमां छूने का हो जाएगा खुद अंदाजा, जब जमी पांव के नीचे से खिसक जाएगी। राहत इंदौरी की ये पंक्तियां मुजफ्फरनगर के मुशायरा प्रेमियों को आज भी याद है।
मुशायरा सुनने का शौक रखने वाले साहित्य से जुड़े प्रदीप जैन कहते हैं कि राहत इंदौरी नुमाइश में होने वाले मुशायरों में हमेशा आते रहे। वह लगभग दस बार यहां आए। उपरोक्त पंक्तियां उनकी मशहूर लाइने हैं। यहां इनको वह हमेशा सुनाते थे। नहीं सुनाते थे तो श्रोता डिमांड कर देते थे। उनकी दो पंक्तियां- हमारे सर की फटी टोपियों पे तंज न कर, हमारे ताज अजायब घरों में रखे हैं। श्रोताओं को काफी पसंद आती थी। उनका अचानक जाना उर्दू शायरी को एक बड़ा झटका है।
मुजफ्फरनगर निवासी देश के जाने माने शायर खालिद जाहिद कहते हैं कि राहत इंदौरी मेरे पिता समान थे। देश से बाहर मेरा पहला मुशायरा नवंबर 2000 में सऊदी में हुआ, इस मुशायरे की शान खुद राहत इंदौरी थे। मुझे खुद यह याद नहीं कि मै देश और विदेश में मुशायरे में शामिल होने के लिए कितनी बार उनके साथ गया। 1995 से मेरे उनसे करीबी ताल्लुकात थे। लगभग 35 साल पहले वह पहली बार मुजफ्फरनगर आए थे। 1999 से लेकर जून 2012 के बीच मुजफ्फरनगर का एक भी ऐसा मुशायरा नहीं रहा, जिसमें राहत इंदौरी नहीं आए। वह जब यहां आते तो उनका खाना मेरे घर पर ही होता था। उनके जाने से मन उदास और दुखी है। बस यही कह सकता हूं- दिलों पे जिसकी करोड़ों के हुक्मरानी थी, वो जिसके दम से जवां बज्मे जिंदगानी थी, अदब को जिसने कमर बनके रोशनी दी थी, सियाह शब को सहर जैसी दिल कशी दी थी, वो जिसके शेर सनद हैं गजल निगारो में, वो जिसका नाम था राहत अदब के पारों में गया ह यू के तअल्लुक तमाम तोड़ गया, हमारे सर पे खुला आसमान छोड़ गया
राहत इंदौरी के साथ सैकड़ों मुशायरे साझा करने वाले देश के बड़े शायर और जनपद के निवासी खुर्शीद हैदर कहते हैं कि उर्दू अदब के एक युग का आज अंत हो गया है। राहत इंदौरी उर्दू के बड़े शायर तो थे ही, उन्होंने फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। मिशन-ए-कश्मीर फिल्म में मुमरो-मुमरो गीत उन्हीं का लिखा है। मुन्ना भाई एमबीबीएस फिल्म में उनके लिखे गीत गाए गए। मै तो खुद उनकी शायरी सुनकर आगे बढ़ा। 1984 से उनके संपर्क में था। लगभग 30 साल उनके साथ मंच साझा किए। उनके पास शब्दों की ऐसी जादूगरी थी कि उनके शब्द जहन में उतर जाते थे। उनके जाने से देश का प्रत्येक शायर उदास है। खतौली निवासी शायर रियाज सागर कहते हैं कि खूबसूरत और लाजवाल अशआर के खालिक़ डॉ राहत इंदौरी की मौत उर्दू शायरी के एक अहद का खात्मा है। न सिफ़ॱर हमारे मुशायरों और कवि सम्मेलनों का नुक़सान है, बल्कि मेरा भी व्यक्तिगत नुकसान है। 1985 से अब तक बहुत से मुशायरे उनके साथ पढ़े और वह मुझे सिफ़ॱर छोटा भाई कहते नहीं थे, बल्कि छोटे भाई की तरह प्यार भी करते थे। इस इलाक़े में कहीं भी आते मेरे घर जरूर आते थे। उनकी मौत से मुझे गहरा झटका लगा है।