नगर में चल रहा गुड़ महोत्सव न केवल गुड़ को व्यावसायिक ऊंचाई देने के लिहाज से अहम है, बल्कि यह परंपरा का संवाहक भी है। इस अनूठे आयोजन में संस्कृति से जुड़े खाद्य पदार्थों के साथ उनका आधुनिक रूप भी नजर आ रहा है। एक ओर राब, शक्कर और खांड़ की धूम है, तो दूसरी तरफ गुड़ के फ्लेवर से लबरेज बिस्किट और पैनकेक हर किसी का ध्यान खींच रहे हैं।
श्रीराम कॉलेज में चल रहे गुड़ महोत्सव में करीब 35 स्टॉलों पर गुड़ और उससे बनने वाले सह उत्पादों को प्रदर्शित किया गया है। आयोजन की खासियत यह है कि इसमें बुजुर्गों और युवा दोनों की पसंद के अनुसार गुड़ के खाद्य पदार्थ हैं। पुरानी पीढ़ी की पहली पसंद रही राब भी कई स्टॉल पर नजर आई। हालांकि कम ही युवा इसके बारे में जानते हैं, लेकिन उन्होंने स्टॉल पर आकर इसकी जानकारी जुटाई। राठी गुड़ उद्योग छछरौली के स्टॉल पर प्लास्टिक के कई डिब्बों में राब रखी मिली।
स्टॉल पर बैठे विनीत कुमार ने बताया कि इन दिनों कोल्हू बंद हो गए हैं, अन्यथा काफी मात्रा में राब बनाकर लाते। अब इसकी बहुत डिमांड नहीं रही, लेकिन पुराने लोग इसके फायदों से परिचित हैं। ठंडी ताशीर की राब को रोटी के साथ खा सकते हैं या शरबत बनाकर पी सकते हैं। गर्मी के मौसम में यह काफी लाभदायक होता है। राब खरीद रहे बरला निवासी बुजुर्ग बलदेव सिंह ने बताया कि पहले वह हर साल एक मटका राब बनवाते थे। उन्हें इसका स्वाद बेहद पसंद रहा, लेकिन अब चंद ही कोल्हू संचालक राब बनाते हैं।
जब गन्ने के रस की चासनी पकाई जाती है तो गुड़ बनने से कुछ पहले वह राब होती है। इसे मिट्टी के बर्तन में भरकर रखा जाता है। अब तो चीनी और चाय ने राब के स्वाद को खत्म कर दिया। गुड़ महोत्सव में राब देखकर अच्छा लगा। शुभम सर्वम सोसायटी बिजनौर के स्टॉल आर्गेनिक गुड़ के साथ शक्कर और खांड़ भी उपलब्ध है। स्टॉल पर मौजूद समरपाल कहते हैं कि खांड़ और शक्कर के गुणों से बुजुर्ग अच्छी तरह परिचित हैं। गुड़ महोत्सव में युवाओं को इन उत्पादों से रू-ब-रू होने का मौका मिल रहा है।
पास में ही रेशू प्रोडक्ट्स के स्टॉल पर राब, गुड़ लड्डृ, खुरपा, बरफी तो नजर आए ही, इसके साथ ही गुड़ के फ्लेवर में बने पैनकेक और कई प्रकार के बिस्किट भी थे। गुड़ के स्वाद वाली टॉफी भी दिखी। स्टॉल पर मौजूद लोगों ने बताया कि रेशू प्रोडक्ट अभी इन चीजों का उत्पादन शुरू कर रही है। सरधना के झिटकरी गांव के विग्योर ऑफ विलेज फूड प्रोडक्ट के स्टॉल पर सिरके की अनेक वैरायटी नजर आईं।
गन्ने, अंगूर, जामुन, अनानास, अनार, आंवला और सेब आदि के सिरके के बारे में जानकारी लेने वालों की लाइन लगी थी। हर कोई सिरके के गुणों और उसकी उपयोगिता की जानकारी चाह रहा था। स्टॉल पर मौजूद नरेश सिरोही उन्हें सिरके के बारे में बताते हैं। महोत्सव के फूड कोर्ट में भी गुड़ की चासनी में लिपटे रसगुल्ले, गजक, चिक्की, तिलनर्गी आदि का स्वाद भी लोगों को खूब भाया।
सफेद रंग के आकर्षण ने हमारे शरीर को रोगी बना दिया
मुजफ्फरनगर। गुड़ गांव के मूल रूप में ही सबसे अच्छा है, गुड़ को उसी रूप में लाना होगा। सफेद रंग की चाह में हमने चीनी का प्रयोग किया, केमिकल से गुड़ के रंग को बदल दिया। इसके बदले में हमें मिला क्या? बीमारियां। अब लोग जागरूक हो रहे हैं तो बिना मसाले के काले गुड़ को ही ढूंढ रहे हैं। वैज्ञानिकों को गुड़ को उसके मूल स्वरूप में लाने के लिए ही कवायद करनी पड़ रही है।
श्रीराम कॉलेज में गुड़ महोत्सव में भाग लेने आए गन्ना शोध केंद्र लखनऊ के प्रमुख वैज्ञानिक दिलीप कुमार ने अमर उजाला से खास बातचीत की। गुड़ पर लगातार शोध कर रहे दिलीप कुमार का कहना है कि दुनिया में कहीं भी गुड़ किसी के लिए हानिकारक नहीं हुआ है। लोगों के लिए औषधि के रूप में काम जरूर आ रहा है। गुड़ का हमारे जनमानस में प्राचीन काल से ही विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में गुड़ भगवान की पूजा में भी प्रयोग होता है। गुड़ की शुद्धता हमेशा बनी रही और यह ग्रामीण अंचल का हमारा मुख्य खाद्य पदार्थ रहा है।
बीते तीन दशक से गुड़ की गुणवत्ता प्रभावित होना शुरू हुई। सफेदी की चाहत में हमने गुड़ के मूल स्वरूप को बिगाड़ दिया। गुड़ से हम सफेद चीनी की तरफ भागे। इसे देख गुड़ बनाने वालों ने भी गुड़ में केमिकल डाल इसका रंग बदल दिया। गुड़ को भी सफेद और सुंदर बना दिया। प्रमुख वैज्ञानिक का कहना है कि गांव के गुड़ का जो मूल स्वरूप था, वही सबसे अच्छा था। केंद्र सरकार ने भी गुड़ की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए मानक निर्धारित कर दिए हैं।
आम आदमी भी अब जागरूक हो रहा है। चीनी के प्रयोग से होने वाले नुकसान और केमिकल के गुड़ से खास लाभ नहीं होने से अब लोग शुद्ध गुड़ की ओर आ रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब गुड़ में केमिकल का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाएगा और गुड़ बनाने में सुकलाई से ही रस की सफाई होगी। देश में जहां भी गुड़ बनता है शुद्धता के लिए वहां सब जगह अब सुकलाई की डिमांड बढ़ रही है।
मेरठ और मुजफ्फरनगर केवीके पर लगेगा आधुनिक कोल्हू
मुजफ्फरनगर। गन्ना शोध केंद्र लखनऊ के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ दिलीप कुमार का कहना है कि गुड़ की शुद्धता और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के छह कृषि विज्ञान केंद्र पर मॉडर्न कोल्हू लगाए जा रहे हैं। अगले दो महीने में कोल्हू लगकर तैयार हो जाएंगे। इनमें मुजफ्फरनगर, मेरठ, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती के कृषि विज्ञान केंद्र शामिल हैं। सामान्य कोल्हू में गन्ने का रस जहां 55 प्रतिशत निकलता है, इस कोल्हू में 70 प्रतिशत निकलेगा। इन कोल्हुओं के माध्यम से किसानों को गुड़ बनाने की ट्रेनिंग दी जाएगी और गुड़ के व्यापार के लिए प्रेरित किया जाएगा।