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सफेद रंग के आकर्षण ने हमारे शरीर को रोगी बना दिया

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सफेद रंग के आकर्षण ने हमारे शरीर को रोगी बना दिया
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मुजफ्फरनगर। गुड़ गांव के मूल रूप में ही सबसे अच्छा है, गुड़ को उसी रूप में लाना होगा। सफेद रंग की चाह में हमने चीनी का प्रयोग किया, केमिकल से गुड़ के रंग को बदल दिया। इसके बदले में हमें मिला क्या? बीमारियां। अब लोग जागरूक हो रहे हैं तो बिना मसाले के काले गुड़ को ही ढूंढ रहे हैं। वैज्ञानिकों को गुड़ को उसके मूल स्वरूप में लाने के लिए ही कवायद करनी पड़ रही है।
श्रीराम कॉलेज में गुड़ महोत्सव में भाग लेने आए गन्ना शोध केंद्र लखनऊ के प्रमुख वैज्ञानिक दिलीप कुमार ने अमर उजाला से खास बातचीत की। गुड़ पर लगातार शोध कर रहे दिलीप कुमार का कहना है कि दुनिया में कहीं भी गुड़ किसी के लिए हानिकारक नहीं हुआ है। लोगों के लिए औषधि के रूप में काम जरूर आ रहा है। गुड़ का हमारे जनमानस में प्राचीन काल से ही विशेष महत्व है। हिंदू धर्म में गुड़ भगवान की पूजा में भी प्रयोग होता है। गुड़ की शुद्धता हमेशा बनी रही और यह ग्रामीण अंचल का हमारा मुख्य खाद्य पदार्थ रहा है। बीते तीन दशक से गुड़ की गुणवत्ता प्रभावित होना शुरू हुई। सफेदी की चाहत में हमने गुड़ के मूल स्वरूप को बिगाड़ दिया। गुड़ से हम सफेद चीनी की तरफ भागे। इसे देख गुड़ बनाने वालों ने भी गुड़ में केमिकल डाल इसका रंग बदल दिया। गुड़ को भी सफेद और सुंदर बना दिया। प्रमुख वैज्ञानिक का कहना है कि गांव के गुड़ का जो मूल स्वरूप था, वही सबसे अच्छा था। केंद्र सरकार ने भी गुड़ की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए मानक निर्धारित कर दिए हैं। आम आदमी भी अब जागरूक हो रहा है। चीनी के प्रयोग से होने वाले नुकसान और केमिकल के गुड़ से खास लाभ नहीं होने से अब लोग शुद्ध गुड़ की ओर आ रहे हैं। वह दिन दूर नहीं जब गुड़ में केमिकल का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाएगा और गुड़ बनाने में सुकलाई से ही रस की सफाई होगी। देश में जहां भी गुड़ बनता है शुद्धता के लिए वहां सब जगह अब सुकलाई की डिमांड बढ़ रही है।
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मेरठ और मुजफ्फरनगर केवीके पर लगेगा आधुनिक कोल्हू
मुजफ्फरनगर। गन्ना शोध केंद्र लखनऊ के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ दिलीप कुमार का कहना है कि गुड़ की शुद्धता और उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रदेश के छह कृषि विज्ञान केंद्र पर मॉडर्न कोल्हू लगाए जा रहे हैं। अगले दो महीने में कोल्हू लगकर तैयार हो जाएंगे। इनमें मुजफ्फरनगर, मेरठ, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बस्ती के कृषि विज्ञान केंद्र शामिल हैं। सामान्य कोल्हू में गन्ने का रस जहां 55 प्रतिशत निकलता है, इस कोल्हू में 70 प्रतिशत निकलेगा। इन कोल्हुओं के माध्यम से किसानों को गुड़ बनाने की ट्रेनिंग दी जाएगी और गुड़ के व्यापार के लिए प्रेरित किया जाएगा।
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