गुजरे जमाने में रेडियो ही था मनोरंजन का माध्यम
मुजफ्फरनगर, खतौली। हम आकाशवाणी से बोल रहे हैं, अब आप सुनेंगे फौजियों की पसंद के नग्मे। एक जमाना था जब आम आदमी के मनोरजंन के लिए रेडियो ही एकमात्र साधन था। रेडियो पर फिल्मी गानों के साथ ही कृषि से संबंधित कार्यक्रम भी प्रसारित किए जाते थे। किसी नामचीन नेता का निधन हो या राष्ट्र की कोई उपलब्धि, इसकी सूचना भी सबसे पहले रेडियो पर दी जाती थी। उस वक्त रेडियो का बैंड लगाने के लिए काफी मशक्कत का सामना करना पड़ता था।
सन 1957 में ऑल इंडिया रेडियों का नाम बदलकर आकाशवाणी कर दिया गया था, जबकि अक्टूबर 1957 में ही विविध भारती शुरू किया गया। 1967 से व्यावसायिक रेडियो प्रसारण ने नए युग में प्रवेश किया। जबकि एक दौर था कि मनोरंजन से लेकर खेती बाड़ी की सूचना रेडियो के माध्यम से ही मिलती थी। बारिश के मौसम में गाने बजाने के लिए रेडियो की बैंड विथ लगना भी महारत का काम था। जंग की सूचना रेडियो पर सुनकर छुट्टियों में घर आए फौजी जवान वापस अपनी बटालियन का रुख करते थे। आधुनिक युग में रेडियो बीते जमाने की बात हो चली है। अब टीवी, मोबाइल, इंटरनेट के दौर में रेडियो की चमक फीकी पड़ गई है।
आनंद स्वरूप, राजेंद्र कुमार, सत्यप्रकाश गुप्ता आदि नागरिकों का का कहना है कि रेडियो अपने समय में मनोरंजन और सूचना का एक मात्र माध्यम था। शादी विवाह में रेडियो देने पर ऐसा माना जाता था, मानों कितना बड़ा उपहार दे दिया गया हो। फिलिप्स के रेडियो काजवाब ही नहीं था। उस जमाने में दो से चार बैंड ही हुआ करते थे, जिन्हें लगाने के लिए छत के एक छोर से दूसरे छोर तक चक्कर काटने पड़ते थे। एक समय था जब रात 12 बजे के बाद किशोर और रफी के पुराने नग्मे सुनने को मिलते थे, वह जमाना ही अलग था। अच्छा रेडियो खरीदने के लिए भी शहर जाना पड़ता था।