कवाल कांड में मलिकपुरा के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या में दोषी करार दिए गए सातों अभियुक्तों को शुक्रवार को अदालत से सजा सुनाए जाने के मद्देनजर क्षेत्र में भारी पुलिस व पीएसी बल तैनात रहा। पुलिस के आला अधिकारी गांव कवाल और मलिकपुरा के बारे में पल पल की जानकारी लेते रहे। एडीजे कोर्ट संख्या सात ने छह फरवरी को ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या में सभी सात आरोपी को दोषी करार दिया था। कोर्ट ने आठ फरवरी को इन सातों अभियुक्तों को सजा सुनाने की तारीख नियत की थी।
छह फरवरी को सुबह से ही गांव कवाल और मलिकपुरा में भारी पुलिस व पीएसी बल तैनात कर दिया था। दोनों गांवों में उसी दिन से रात और दिन पुलिस और पीएसी बल तैनात है। शुक्रवार को कोर्ट द्वारा सजा सुनाए जाने को लेकर प्रशासन ने सुरक्षा की दृष्टि से थाना जानसठ के अलावा, रामराज, ककरौली आदि थानों की भारी पुलिस व पीएसी बल को भी क्षेत्र तैनात कर दिया था।
गांव कवाल में कई स्थानों पर पुलिस व पीएसी बल तैनात रहा। गांव मलिकपुरा में एसडीएम जानसठ विजय कुमार, सीओ भोपा राममोहन शर्मा व जानसठ सीओ सोमेंद्र नेगी पुलिस व पीएसी बल के साथ मौजूद रहे। एसडीएम ने कई बार गांव कवाल व मलिकपुरा में घूमकर स्थिति का जायजा लिया। ग्रामीणों की प्रतिक्रिया के बारे में पुलिस के आला अफसर पल पल की जानकारी एसडीएम व सीओ से लेते रहे। हालांकि दोनों गांवों में सब कुछ सामान्य रहा।
सलीम के परिवार में मचा कोहराम मचा
जानसठ। गांव कवाल में सलीम के परिवार में उस वक्त कोहराम मच गया, जब उनको पता चला कि कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। बता दें कि कवाल कांड में सलीम का पुत्र शाहनवाज भी मारा गया था। ममेरे भाइयों सचिव और गौरव हत्याकांड में सलीम के मृतक पुत्र शाहनवाज सहित जहांगीर व नदीम को भी नामजद कराया गया था। दोनों भाई जेल में बंद थे। शुक्रवार को कोर्ट ने हत्याकांड में दोषी कराए दिए गए सात अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसकी खबर मिलने पर सलीम के परिवार में कोहराम मच गया। परिवार की महिलाएं रोने बिलखने लगीं। इनके अलावा अन्य आरोपियों के घर में भी सजा की खबर मिलने पर मातम छा गया।
50 हजार से अधिक लोग हो गए थे बेघर
करीब साढ़े पांच साल पहले कवाल कांड के बाद जिले में फिजा खराब होती चली गई। सात सितंबर 2013 की नंगला मंदौड़ की पंचायत से लौटते लोगों पर हमले के बाद अगले दिन आठ सितंबर को जो दंगा हुआ उसने जनपद ही नहीं पूरे पश्चिम में नफरत का माहौल पैदा कर दिया। दंगों में 65 लोगों की मौत हुई और 50 हजार से अधिक लोग बेघर हो गए। हिंदू-मुस्लिमों के बीच वर्षों का भरोसा टूट गया। महीनों तक साइलेंट वार ने जिले में खौफ का माहौल बनाए रखा।
27 अगस्त 2013 में कवाल में सचिन और गौरव की जघन्य हत्या के बाद जिले के हालात खराब होते चले गए। फिजा इतनी खराब हुई कि यहां वर्षों का हिंदू-मुस्लिम का आपसी विश्वास टूट गया। सात सितंबर की शाम पंचायत से लौटते लोगों पर हमले की घटनाओं ने पूरे जिले को आग में झोंक दिया। इसी दिन शहर में शाम के समय खालापार में छोले भटूरे की ठेली लगाने वाले दामोदर शर्मा और पत्रकार राजेश वर्मा की हत्या के बाद कर्फ्यू लगा दिया गया। आठ सितंबर को शाहपुर, बुढ़ाना, फुगाना, मंसूरपुर भोपा क्षेत्र के गांवों में भड़के दंगे में 65 लोगों की मौत हो गई। जिले में 50 हजार से अधिक लोग बेघर होकर सड़क पर आ गए। मुस्लिम बहुल गांवों बसी, जौला, तावली, खामपुर में शरणार्थी कैंप लगे।
देश की राजनीति में आया सियासी भूचाल
मुजफ्फरनगर। दंगे के बाद देश की राजनीति में सियासी भूचाल आ गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी दंगा पीड़ितों के बीच पहुंचे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मलिकपुरा और कवाल दोनों गांव में आए। मृतकों के परिजनों को सांत्वना दी।
भाजपा के पक्ष में बनता चला गया माहौल
मुजफ्फरनगर। जिले में जिस समय दंगे हुए उस समय सपा की सरकार थी। शहर सीट से सपा के विधायक चितरंजन स्वरूप मंत्री थे। बुढ़ाना से सपा के ही नवाजिश आलम विधायक थे। तीन सीटों पर बसपा के विधायक थे, इनमें पुरकाजी से अनिल कुमार, चरथावल से नूरसलीम राना, मीरापुर से मौलाना जमील एमएलए थे। खतौली से रालोद के करतार सिंह भडाना विधायक थे। जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर इंतखाब राना का कब्जा था। सांसद कादिर राना थे।
दंगे के बाद राजनीति ने करवट बदली। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में सांसद भाजपा के डॉ संजीव बालियान बने और जिला पंचायत अध्यक्ष पर भाजपा की ही आंचल तोमर बैठी। विधानसभा चुनाव में भी जिले की सभी छह सीटों पर भाजपा जीत गई। शहर सीट से कपिलदेव अग्रवाल, चरथावल से विजय कश्यप, खतौली से विक्रम सैनी, मीरापुर से अवतार भड़ाना, बुढाना से उमेश मलिक, पुरकाजी से प्रमोद ऊंटवाल चुने गए। जिले में ही नहीं पूरे प्रदेश में भाजपा के पक्ष में एकतरफा माहौल बना।